दु:ख भोगना पड़ रहा है? देखो, पिता को क्या धुन समायी है। कहते हैं कि चन्द्रकान्ता को कुंवारी ही रक्खूँगा। हाय ! वीरेन्द्र के पिती ने शादी करने के लिए कैसी-कैसी खुशामदें कीं , मगर दुष्ट क्रूर के बाप कुपथसिंह ने उसको ऐसा कुछ बस में कर रखा है कि कोई काम नहीं होने देता, और उधर कम्बख्त क्रूर अपनी ही लसी लगाना चाहता है।’’ एकाएक चपला ने चन्द्रकान्ता का हाथ पकड़कर जोर से दबाया मानो चुप रहने के लिए इशारा किया। चपला के इशारे को समझ चन्द्रकान्ता चुप हो रही और चपला का हाथ पकड़कर फिर बाग में टहलने लगी, मगर अपना रुमाल उसी जगह जान-बूझकर गिराती गई। थोड़ी दूर आगे बढ़कर उसने चम्पा से कहा, ‘‘ सखी देख तो, फौव्वारे के पास कहीं मेरा रुमाल गिर पड़ा है।’’ चम्पा रुमाल लेने फौव्वारे की तरफ चली गयी तब चन्द्रकान्ता ने चपला से पूछा, ‘‘सखी, तूने बोलते समय मुझे एकाएक क्यों रोका?’’ चपला ने कहा, ‘‘ मेरी प्यारी
उन्हें अपने साथ मिला लूंगा। क्रूरसिंह ने काम हो जाने पर मुसलमानी मजहब अख्तियार करने का एकरारनामा लिख कर फौरन नाजिम और अहमद के हवाले किया, जिस पर अहमद ने क्रूरसिंह से कहा, “अब सब मुसलमानों को एक दिल कर लेना हम लोगों के जिम्मे है, इसके लिए आप कुछ न सोचिये, हाँ हम दोनों आदमियों के लिए भी एक एकरारनामा इस बात का हो जाना चाहिये कि आपके राजा होने पर हमीं दोनों वजीर मुकर्रर किये जायंगे, और तब हम लोगों की चालाकी का तमाशा देखिये कि बात की बात में जमाना कैसे उलट पुलट कर देते हैं!” क्रूरसिंह ने झटपट