दरबार में लौट आये। दरबार उसी तरह लगा हुआ था, तेजसिंह भी अपनी जगह बैठे थे। उनको देख प्यादों के होश उड़ गये और अर्ज करते-करते रुक गये। तेजसिंह ने इनकी तरफ देखकर पूछा, ‘‘क्यों ? क्या बात है, उस ऐयार को कैद कर आये ?’’ प्यादों ने डरते-डरते कहा, ‘‘जी उसको तो आप ही ने हम लोगों से ले लिया।’’ तेजसिंह उनकी बात सुनकर चौंक पड़े और बोले, ‘‘मैंने क्या किया है ? मैं तो तब से इसी जगह बैठा हूँ !’’ प्यादों की जान डर और ताज्जुब से सूख गई, कुछ जवाब न दे सके, पत्थर की तस्वीर की तरह जैसे-के-तैसे खड़े रहे। महाराज ने तेजसिंह की तरफ देखकर पूछा, ‘‘क्यों ? क्या हुआ ?’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘ऐयार चालाकी खेल गये, मेरी सूरत बना उसी कैदी को इन लोगों से छुड़ा ले गये !’’ तेजसिंह ने अर्ज किया, ‘‘महाराज इन लोगों का कसूर नहीं, ऐयार लोग ऐसे ही होते हैं, बड़े-बड़ों को धोखा दे जाते हैं, इन लोगों की क्या हकीकत


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!’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘मगर शर्त यह है कि उससे कम न हो, क्योंकि आपका रुतबा उससे कहीं ज्यादा है।’’ वीरेन्द्रसिंह ने कहा, ‘‘तो इस वक्त कहाँ से लायें ?’’तेजसिंह ने जवाब दिया, ‘‘तमस्सुक लिख दो!’’ कुमार हंस पड़े और उंगली से हीरे की अंगजी उतारकर दे दी। तेजसिंह ने खुश होकर ले ली औऱ कहा, ‘‘परमेश्वर आपकी मुराद पूरी करे। अब हम लोगों को भी यहाँ से अपने घर चले चलना चाहिए क्योंकि अब मैं चुनार जाऊंगा, देखूं शैतान का बच्चा वहाँ क्या बन्दोबस्त कर रहा है।’’ चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : दसवां बयान) क्रूरसिंह की


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