सखी, मुझको चम्पा पर शुबहा हो गया है। उसकी बातों और चितवनों से मालूम होता है कि वह असली चम्पा नहीं है।’’ इतने में चम्पा ने रुमाल लाकर चपला के हाथ में दिया। चपला ने चम्पा से पूछा, ‘‘सखी, कल रात को मैंने तुझको जो कहा था सो तैने किया?’’ चम्पा बोली, ‘‘नहीं, मैं तो भूल गयी।’’ तब चपला ने कहा, ‘‘भला वह बात तो याद है या वो भी भूल गयी?’’ चम्पा बोली, ‘‘बात तो याद है।’’ तब फिर चपला ने कहा, ‘‘भला दोहरा के मुझसे कह तो सही तब मैं जानू की तुझे याद है।’’ इस बात का जवाब न देकर चम्पा ने दूसरी बात छेड़ दी जिससे शक की जगह यकीन हो गया कि यह चम्पा नहीं है। आखिर चपला यह कहकर कि मैं तुझसे एक बात कहूँगी, चम्पा को एक किनारे ले गयी और कुछ मामूली बातें करके बोली,‘‘देख तो चम्पा, मेरे कान से कुछ बदबू तो नहीं आती ? क्योंकि कल से कान में दर्द है।’’ नकली चम्पा चपला के फेर में पड़ गयी और फौरन


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इस बात का भी एकरारनामा लिख दिया जिससे वे दोनों बहुत ही खुश हुए। इसके बाद नाजिमने कहा, “इस वक्त हम लोग चन्द्रकान्ता के हालचाल की खबर लेने जाते हैं क्योंकि यह शाम का वक्त बहुत अच्छा है, चन्द्रकान्ता जरूर बाग में गई होगी और अपनी सखी चपला से अपनी विरह कहानी कहती होगी, इसलिए हमको इसका पता लगाना कोई मुश्किल न होगा कि आजकल बीरेन्द्रसिंह और चन्द्रकान्ता के बीच में क्या हो रहा है।” यह कह कर दोनों ऐयार क्रूरसिंह से बिदा हुए। चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : तीसरा बयान) कुछ-कुछ दिन बाकी है, चन्द्रकान्ता, चपला और


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