उन लोगों के साथ-साथ महल के नीचे चली आई औऱ गाने लगी। उसके गाने महाराज को बेताब कर दिया। दिल को रोक न सके, हुक्म दिया कि उसको दीवान खाने में ले जाकर बैठाया जाय और रोशनी का बन्दोबस्त हो, हम भी आते हैं। महारानी ने कहा, ‘‘आवाज से यह औरत मालूम होती है, क्या हर्ज है अगर महल में बुला ली जाये।’’ महाराज ने कहा, ‘‘पहले उसको देख-समझ लें तो फिर जैसा होगा किया जायेगा, अगर यहाँ आने लायक होगी तो तुम्हारी भी खातिर कर दी जायेगी।’’ हुक्म की देर थी, सब सामान लैस हो गया। महाराज दीवान खाने में जा विराजे। बीबी चपला ने झुककर सलाम किया। महाराज ने देखा कि एक औरत निहायत हसीन, रंग गोरा, सुरमई रंग की साड़ी और धानी बूटीदार चोली दक्षिणी ढंग पर पहने पीछे से लांग बांधे, खुलासा गड़ारीदार जूड़ा कांटे से बांधे, जिस पर एक छोटा –सा सोने का फूल, माथे पर एक बड़ा-सा रोली का टीका लगाये, कानों में सोने की निहायत खूबसूरत


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सामने बैठे गप्पें उड़ा रहे हैं। बाहर-भीतर खूब सन्नाटा है। तेजसिंह इत्र की शीशियाँ लिए सामने पहुंचे और सलाम कर बैठ गये, तब कहा, ‘‘लखनऊ का रहने वाला गन्धी हूँ, आपका नाम सुनकर आप ही के लायक अच्छे-अच्छे इत्र लाया हूँ !’’ यह कह शीशी खोल फाहा बनाने लगे। हरदयालसिंह बहुत रहमदिल आदमी थे, इत्र सूंघने लगे और फाहा सूंघ-सूंघ अपने दोस्तों को भी देने लगे। थोड़ी देर में हरदयालसिंह और उसके सब दोस्त बेहोश होकर जमीन पर लेट गये। तेजसिंह ने सभी को उसी तरह छोड़ हरदयालसिंह की गठरी बाँध पीठ पर लादी और मुंह पर


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