जड़ाऊ बालियां पहने, नाक में सरजा की नथ, एक टीका सोने का और घुंघरूदार पटड़ी गूथन के गले में पहने, हाथ में बिना घुंडी का कड़ा व छन्देली जिसके ऊपर काली चूड़ियां, कमर में लच्छेदार कर्धनी और पैर में सांकड़ा पहने अजब आनबान से सामने खड़ी है। गहना तो मुख्तसर ही है मगर बदन की गठाई और सुडौली पर इतना ही आफत हो रहा है। गौर से निगाह करने पर एक छोटा-सा तिल ठुड्डी के बगल में देखा जो चेहरे को औऱ भी रौनक दे रहा था। महाराज के होश जाते रहे, अपनी महारानी साहब को भूल गये जिस पर रीझे हुए थे, झट मुंह से निकल पड़ा, वाह ! क्या कहना है !’’ टकटकी बंध गई। महाराज ने कहा, ‘‘आओ, यहाँ बैठो।’’ बीबी चपला कमर को बल देती हुई अठखेलियों के साथ कुछ नजदीक जा सलाम करके बैठ गई। महाराज उसके हुस्न के रोब में आ गये। ज्यादा कुछ कह न सके एकटक सूरत देखने लगे। फिर पूछा, ‘‘तुम्हारा मकान कहाँ है ? कौन हो ?


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कपड़ा ओढ़ नौगढ़ का रास्ता लिया, राह में अगर कोई मिला भी तो धोबी समझ कर न बोला। शहर के बाहर निकल गये औऱ बहुत तेजी के साथ चल कर उस खोह में पहुंचे जहाँ अहमद को कैद किया था। किवाड़ खोलकर अन्दर गये और दीवान साहब को उसी तरह बेहोश वहाँ रख अंगजी मोहर की उनकी उंगली से निकाल ली, कपड़े भी उतार लिये औऱ बाहर चले आये। बेड़ी डालने और होश में लाने की कोई जरूरत न समझी। तुरन्त लौट विजयगढ़ आ हरदयालसिंह की सूरत बना कर उसके घर पहुंचे। इधर दीवान साहब के भोजन करने का वक्त आ पहुंचा।


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