क्या काम है ? तुम्हारी जैसी औऱत का अकेली रात के समय घूमना ताज्जुब में डालता है।’’ उसने जवाब दिया, ‘‘मैं ग्वालियर की रहने वाली पटलापा कत्थक की लड़की हूँ। रम्भा मेरा नाम है। मेरा बाप भारी गवैया था। एक आदमी पर मेरा जी आ गया, बात-की-बात में वह मुझसे गुस्सा हो के चला गया, उसी की तलाश में मारी-मारी फिरती हूँ। क्या करूं, अकसर दरबारों में जाती हूं कि शायद कहीं मिल जाये क्योंकि वह भी बड़ा भारी गवैया है, सो ताज्जुब नहीं, किसी दरबार में हो, इस वक्त तबीयत की उदासी में यों ही कुछ गा रही थी कि सरकार ने याद किया, हाजिर हुई।’’ महाराज ने कहा, ‘‘तुम्हारी आवाज बहुत भली है, कुछ गाओ तो अच्छी तरह सुनूं !’’ चपला ने कहा, ‘‘महाराज ने इस नाचीज पर बड़ी मेहरबानी की जो नजदीक बुलाकर बैठाया और लौंडी को इज्जत दी। अगर आप मेरा गाना सुनना चाहते हैं तो अपने मुलाजिम सपर्दारों को तलब करें, वे लोग साथ दें तो कुछ गाने का लुत्फ आये, वैसे


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लौंडी बुलाने आई, देखा कि दीवान साहब तो हैं नहीं, उनके चार-पाँच दोस्त गाफिल पड़े हैं। उसे बड़ा ताज्जुब हुआ और एकाएक चिल्ला उठी। उसकी चिल्लाहट सुन नौकर और प्यादे आ पहुंचे तथा यह तमाशा देख हैरान हो गये, दीवान साहब को इधर-उधर ढूंढ़ा मगर कहीं पता न लगा। चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : तेरहवां बयान ) तीन पहर रात गुजर गई, उनके सब दोस्त तो बेहोश पड़े थे वह भी होश में आये मगर अपनी हालत देख-देख हैरान थे। लोगों ने पूछा, ‘‘आप लोग कैसे बेहोश हो गये और दीवान साहब कहाँ हैं ?’’ उन्होंने कहा, ‘‘एक गंधी


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