हाय ! अब तो इसी मकान में मुझको भी मरना पड़ा। मैं समझता हूँ राजा सुरेन्द्रसिंह की जान भी इसी मकान में जायेगी ! हाय, अभी क्या सोच रहे थे, क्या हो गया ! विधाता तूने क्या किया ?’’ इतने में तेजसिंह आये। देखा कि वीरेन्द्रसिंह पड़े हैं और महाराज उनके ऊपर हाथ रखें रो रहे हैं। तेजसिंह की जो कुछ जान बची थी वह भी निकल गई। वीरेन्द्रसिंह की लाश के पास बैठ गये और जोर से बोले, ‘‘कुमार, मेरा जी तो रोने को भी नहीं चाहता क्योंकि मुझको अब इस दुनिया में नहीं रहना है, मैं तो खुशी-खुशी तुम्हारा साथ दूंगा !’’ यह कह कर कमर से खंजर निकाला और पेट में मारना ही चाहते थे कि दीवार फांदकर एक आदमी ने आकर हाथ पकड़ लिया। तेजसिंह ने उस आदमी को देखा जो सिर से पैर तक सिन्दूर से रंगा हुआ था उसने कहा- ‘‘काहे को देते हो जान, मेरी बात सुनो दे कान यह सब खेल ठगी को मान, लाश देखकर लो पहचान उठो देखो भालो, खोजो
इसके लिए सोचना क्या ? दस-पाँच दिन सब्र कीजिए, देखिए क्या होता है ? इस बीच में, अगर वह न आया तो आपको जो कुछ करना हो कीजिएगा।’’ वीरेन्द्रसिंह ने जवाब दिया, ‘‘हाँ, आपका कहना ठीक है मगर पता लगाना जरूरी है, यह सोचकर कि वह चालाक है, खुद छूट जायेगा-खोज न करना मुनासिब नहीं।’’ जीतसिंह ने कहा, ‘‘सच है, आपको मुहब्बत के सबब से उसका ज्यादा खयाल है, खैर, देखा जायगा।’’ यह सुन राजा सुरेन्द्रसिंह ने कहा, ‘‘और कुछ नहीं तो किसी को पता लगाने के लिए भेज दो।’’ इसके जवाब में दीवान साहब ने कहा,