नहीं कि यह कौन था मगर इतना पता लग गया कि चंद्रकान्ता और चपला को शिवदत्तसिंह के ऐयार चुरा ले गए हैं और ये बनावटी लाश यहां रख गए हैं जिससे सब कोई जानें कि वे मर गईं और खोज न करें।” महाराज बोले, “यह कैसे मालूम कि यह लाश बनावटी हैं?” तेजसिंह ने कहा, “यह कोई बड़ी बात नहीं है, लाश के पास चलिए मैं अभी बतला देता हूं।” यह सुन महाराज तेजसिंह के साथ लाश के पास गए, महारानी भी गईं। तेजसिंह ने अपनी कमर से खंजर निकालकर चपला की लाश की टांग काट ली और महाराज को दिखलाकर बोले, “देखिए इसमें कहीं हड्डी है।” महाराज ने गौर से देखकर कहा, “ठीक है, बनावटी लाश है।” इसके पीछे चंद्रकान्ता की लाश को भी इसी तरह देखा, उसमें भी हड्डी नहीं पाई। अब सबों को मालूम हो गया कि ऐयारी की गई है। महाराज बोले, “अच्छा यह तो मालूम हुआ कि चंद्रकान्ता जीती है, मगर दुश्मनों के हाथ पड़ गई इसका गम क्या कम है?” तेजसिंह


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से अर्ज किया कि ‘‘नौगढ़ में भी तेजसिंह नहीं हैं, यह उनके बाप जीतसिंह के हाथ का खत मेरे खत के जवाब में आया है’। महाराज ने कहा, ‘‘उसका पता लगाने के लिए कुछ फिक्र की गयी है या नहीं ?’’ हरदयालसिंह ने कहा, ‘‘हाँ, कई जासूस मैंने इधर-उधर भेजे हैं।’’ महाराज को तेजसिंह का बहुत अफसोस रहा, दरबार बर्खास्त करके महल में चले गये। बात-की-बात में महाराज ने तेजसिंह का जिक्र महारानी से किया और कहा, ‘‘किस्मत का फेर इसे ही कहते हैं। क्रूरसिंह ने तो हलचल मचा ही रक्खी थी, मदद के वास्ते एक तेजसिंह आया था सो कई


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