इधर-उधर रंग फैला दिया है जिससे लोग कुमारी को मरी हुई जानकर पीछा और खोज न करें।” कुमार ने कहा, “तुम हमें धोखा देते हो! हम कैसे जानें कि वह लाश नकली है?” तेजसिंह ने कहा, “मैं अभी आपको यकीन करा देता हूं।” यह कह कमरे का दरवाजा खोला, देखा कि महाराज खड़े हैं, आंखों से आंसू जारी हैं। तेजसिंह को देखते ही पूछा, “क्या हाल है?” जवाब दिया, “अच्छे हैं, होश में आ गए, चलिए देखिए।” यह सुन महाराज अंदर गए, उन्हें देखते ही कुमार उठ खड़े हुए, महाराज ने गले से लगा लिया। पूछा, “मिजाज कैसा है!” कुमार ने कहा, “अच्छा है!” कई लौंडियां भी उस जगह आईं जिनको कुमार का हाल लेने के लिए महारानी ने भेजा था। एक लौंडी से तेजसिंह ने कहा, “दोनों लाशों में से जो टुकड़े हाथ-पैर के मैंने काटे थे उन्हें ले आ।” यह सुन लौंडी दौड़ी गई और वे टुकड़े ले आई। तेजसिंह ने कुमार को दिखलाकर कहा, “देखिए यह बनावटी लाश है या नहीं,


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रोने लगी। इसकी हालत से चन्द्रकान्ता समझ गई कि चपला भी तेजसिंह को चाहती है, मगर सोचने लगी कि चलो अच्छा ही है इसमें भी हमारा ही भला है, मगर तेजसिंह के हाल और चपला की हालत पर बहुत अफसोस हुआ, फिर चपला से कहा, ‘‘उनको छुड़ाने की यही फिक्र हो रही है ? क्या तेरे रोने से वे छूट जायेंगे ? तुझसे कुछ नहीं हो सकता तो मैं ही कुछ करूं ?’’ चम्पा भी वहाँ बैठी यह अफसोस भरी बातें सुन रही थी, बोली, ‘‘अगर हुक्म हो तो मैं तेजसिंह की खोज में जाऊं ?’’ चपला ने कहा, ‘‘अभी तू इस लायक नहीं हुई है ?’’ चम्पा बोली, ‘‘क्यों, अब


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