इसमें हड्डी कहां है?” कुमार ने देखकर कहा, “ठीक है, मगर उन लोगों ने बड़ी बदमाशी की!” तेजसिंह ने कहा, “खैर जो होना था हो गया, देखिए अब हम क्या करते हैं।” सबेरा हो गया। महाराज, कुमार और तेजसिंह बैठे बातें कर रहे थे कि हरदयालसिंह ने पहुंचकर महाराज को सलाम किया। उन्होंने बैठने का इशारा किया। दीवान साहब बैठ गये और सबों को वहां से हट जाने के लिए हुक्म दिया। जब निराला हो गया हरदयालसिंह ने तेजसिंह से पूछा, “मैंने सुना है कि वह बनावटी लाश थी जिसको सभी ने कुमारी की लाश समझा था?” तेजसिंह ने कहा, “जी हां ठीक बात है!” और तब बिल्कुल हाल समझाया। इसके बाद दीवान साहब ने कहा, “और गजब देखिए! कुमारी के मरने की खबर सुनकर सब परेशान थे, सरकारी नौकरों में से जिन लोगों ने यह खबर सुनी दौड़े हुए महल के दरवाजे पर रोते-चिल्लाते चले आये, उधर जहां ऐयार लोग कैद थे पहरा कम रह गया, मौका पाकर
मेरे में क्या कसर है ? क्या मैं ऐयारी नहीं कर सकती ?’’ चपला ने कहा, ‘‘हाँ, ऐयारी तो कर सकती है मगर उन लोगों का मुकाबला नहीं कर सकती जिन लोगों ने तेजसिंह जैसे चालाक ऐयार को पकड़ लिया है। हाँ, मुझको राजकुमारी हुक्म दें तो मैं खोज में जाऊं ?’’ चन्द्रकान्ता ने कहा, ‘‘इसमें भी हुक्म की जरूरत है ? तेरी मेहनत से अगर वे छूटेंगे तो जन्म भर उनको कहने लायक रहेगी। अब तू जाने में देर मत कर, जा।’’ चपला ने चम्पा से कहा, ‘‘देख, मैं जाती हूँ, पर ऐयार लोग बहुत से आये हुए हैं, ऐसा न हो कि मेरे जाने के बाद कुछ नया बखेड़ा