उनके साथी ऐयारों ने वहां धाावा किया और पहरे वालों को जख्मी कर अपनी तरफ के सब ऐयारों को जो कैद थे छुड़ा ले गए।” यह खबर सुरकर तेजसिंह, कुमार और महाराज सन्न हो गये। कुमार ने कहा, “बड़ी मुश्किल में पड़ गये। अब कोई भी ऐयार उनका हमारे यहां न रहा, सब छूट गये। कुमारी और चपला को ले गये यह तो गजब ही किया! अब नहीं बर्दाश्त होता, हम आज ही कूच करेंगे और दुश्मनों से इसका बदला लेंगे।” यह बात कह ही रहे थे कि एक चोबदार ने आकर अर्ज किया कि “लड़ाई की खबर लेकर एक जासूस आया है, दरवाजे पर हाजिर है, उसके बारे में क्या हुक्म होता है?” हरदयालसिंह ने कहा, “इसी जगह हाजिर करो।” जासूस लाया गया। उसने कहा, “दुश्मनों को रोकने के लिए यहां से मुसलमानी फौज भेजी गई थी। उसके पहुंचने तक दुश्मन चार कोस और आगे बढ़ आये थे। मुकाबले के वक्त ये लोग भागने लगे, यह हाल देखकर तोपखाने वालों ने पीछे से बाढ़
मचे। खैर, और तो जो होगा देखा जायेगा, तू राजकुमारी से होशियार रहियो। अगर तुझसे कुछ भूल हुई या राजकुमारी पर किसी तरह की आफत आई तो मैं जन्म-भर तेरा मुंह न देखूंगी !’’ चम्पा ने कहा, ‘‘इस बात से आप खातिर जमा रखें, मैं बराबर होशियार रहा करूंगी।’’ चपला अपने ऐयारी के सामान से लैस हो और कुछ दक्षिणी ढंग के जेवर तथा कपड़े ले तेजसिंह की खोज में निकली। चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : सत्रहवाँ बयान) चपला कोई साधारण औऱत न थी। खूबसूरती और नजाकत के अलावा उसमें ताकत भी थी। दो-चार आदमियों से लड़