करने लगे। कुमार ने पूछा, “कहो देवीसिह, तुमने यहां आकर क्या-क्या किया?” तेजसिह ने कहा, “इनका हाल मुझसे सुनिये, मैं मुख्तसर में आपको समझा देता हूं।” कुमार ने कहा, “कहो!” तेजसिंह बोले, “जब आप चंद्रकान्ता के बाग में बैठे थे और भूत ने आकर कहा था कि ‘खबर भई राजा को तुमरी सुनो गुरुजी मेरे!’ जिसको सुनकर मैंने जबर्दस्ती आपको वहां से उठाया था, वह भूत यही थे। नौगढ़ में भी इन्होंने जाकर क्रूरसिंह के चुनार जाने और ऐयारों को संग लाने की खबर खंजरी बजाकर दी थी। जब चंद्रकान्ता के मरने का गम महल में छाया हुआ था और आप बेहोश पड़े थे तब भी इन्हीं ने चंद्रकान्ता और चपला के जीते रहने की खबर मुझको दी थी, तब मैंने उठकर लाश पहचानी नहीं होती तो पूरे घर का ही नाश हो चुका था। इतना काम इन्होंने किया। इन्हीं को बुलाने के वास्ते मैंने सुबह मुनादी करवाई थी, क्योंकि इनका कोई ठिकाना तो था ही नहीं।” यह


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सीधे चुनार की तरफ पहाड़-ही-पहाड़ चल निकली, जब सुबह करीब हुई उसने अपनी सूरत एक मर्द सिपाही की-सी बना ली। नहाने–धोने, खाने-पीने की कुछ फिक्र नहीं सिर्फ रास्ता तय करने की उसको धुन थी। आखिर भूखी-प्यासी शाम होते चुनार पहुंची। दिल में ठान लिया था कि जब तक तेजसिंह का पता न लगेगा-अन्न जल ग्रहण न करूँगी। कहीं आराम न लिया, इधर-उधर ढूंढ़ने और तलाश करने लगी। एकाएक उसे कुछ चालाकी सूझी, उसने अपनी पूरी सूरत पन्नालाल की बना ली औऱ घसीटासिंह ऐयार के डेरे पर पहुंची। हम पहले लिख चुके हैं कि छ : ऐयारों में


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