के जल्दी मामला तै कर लें। शिवदत्तसिंह अपने को अर्जुन समझते हैं, उनके मुकाबले के लिए मैं मौजूद हूं, क्यों बेचारे गरीब सिपाहियों की जान जाय।” देवीसिंह ने कहा, “बहुत अच्छा, अभी इस मामले को तै कर डालता हूं!” यह कह मैदान में गये और अपनी चादर हवा में दो-तीन दफे उछाली। चादर उछालनी थी कि झट बद्रीनाथ ऐयार महाराज शिवद्त्त के लश्कर से निकल के मैदान में देवीसिंह के पास आये और बोले, “जय माया की!” देवीसिंह ने भी जवाब दिया, “जय माया की!” बद्रीनाथ ने पूछा, “क्यों क्या बात है जो मैदान में आकर ऐयारों को बुलाते हो?” देवी-तुमसे एक बात कहनी है! बद्री-कहो। देवी-तुम्हारी फौज में मर्द बहुत हैं कि औरत? बद्री-औरत की सूरत भी दिखाई नहीं देती! देवी-तुम्हारे यहां कोई बहादुर भी है कि सब गरीब सिपाहियों की जान लेने और आप तमाशा देखने वाले ही हैं? बद्री-हमारे यहां खचियों बहादुर भरे हैं?


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भैरवी गाने के बाद चपला ने बन्द करके अर्ज किया, ‘‘महाराज, अब सुबह हो गई, मैं भी कल की थकी हूं क्योंकि दूर से आई थी, अब हुक्म हो तो रुखसत होऊं ?’’ चपला की बात सुनकर महाराज चौंक पड़े। देखा तो सचमुच सवेरा हो गया है। अपने गले से मोती की माला उतारकर इनाम में दी और बोले, ‘‘अभी हमारा जी तुम्हारे गाने से बिल्कुल नहीं भरा है, कुछ रोज यहाँ ठहरो, फिर जाना !’’ रम्भा ने कहा, ‘‘अगर महाराज की इतनी मेहरबानी लौंडी के हाल पर है तो मुझको कोई उज्र रहने में नहीं !’’ महाराज ने हुक्म दिया कि रम्भा के रहने का पूरा


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