छिपा दी जायगी तब और भी मुश्किल होगी। इससे यही ठीक है कि कुमार के पास लौट चलूं और वहां से कुछ आदमियों को लाऊं क्योंकि इस नाले में अकेले जाकर इन लोगों का मुकाबला करना ठीक नहीं है। यही सब-कुछ सोच तेजसिंह विजयगढ़ की तरफ चले, रात भर चले गये, दूसरे दिन दोपहर को वीरेन्द्रसिंह के पास पहुंचे। कुमार ने तेजसिंह को गले लगाया और बेताबी के साथ पूछा, “क्यों कुछ पता लगा?” जवाब में ‘हां’ सुनकर कुमार बहुत खुश हुए और सभी को बिदा किया, केवल कुमार, देवीसिंह,फतहसिंह सेनापति और तेजसिंह रह गये। कुमार ने खुलासा हाल पूछा, तेजसिंह ने सब हाल कह सुनाया और बोले, “अगर किसी दूसरे को छुड़ाना होता या किसी गैर को पकड़ना होता तो मैं अपनी चालाकी कर गुजरता, अगर काम बिगड़ जाता तो भाग निकलता, मगर मामला चंद्रकान्ता का है जो बहुत सुकुमार है। न तो मैं अपने हाथ से उसकी गठड़ी बांधा सकता हूं और न किसी तरह की तकलीफ दिया चाहता


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लें तो मैं शहर जाने से बचूं और आपका अहसान मानूं। चोबदार ने कहा, ‘‘क्या हर्ज है, तू दूध ही दे दे।’’ बस अहीरन ने खांचा रख दिया और दूध देने लगी। चोबदार ने उन दोनों ऐयारों से कहा, ‘‘आइए, आप भी लीजिए।’’ उन दोनों ऐयारों ने कहा, ‘‘हमारा जी नहीं चाहता !’’ वह बोली, ’’अच्छा आपकी खुशी।’’ चोबदार ने दूध पिया और तब फिर दोनों ऐयारों से कहा, ‘‘वाह ! क्या दूध है ! शहर में तो रोज आप पीते ही हैं, भला आज इसको भी तो पीकर मजा देखिए !’’ उसके जिद्द करने पर दोनों ऐयारों ने भी दूध पिया और चार पैसे दूध वाली को


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