खोज में होगा कि हम लोग कहां जाते हैं।” देवीसिंह ने कहा, “हां इसमें कोई शक नहीं कि यह सगुन खराब हुआ।” यह सुनकर कुमार का कलेजा धाड़कने लगा। बोले, “फिर अब क्या किया जाय?” तेजसिंह ने कहा, “इस वक्त और कोई तरकीब तो हो नहीं सकती है, हां एक बात है कि हम लोग जंगल का रास्ता छोड़ मैदान-मैदान चलें। ऐसा करने से पीछे का आदमी आता हुआ मालूम होगा।” कुमार ने कहा, “अच्छा तुम आगे चलो।” अब वे तीनों जंगल छोड़ मैदान में हो लिए। पीछे फिर-फिर के देखते जाते थे मगर कोई आता हुआ मालूम न पड़ा। रात भर बेखटके चलते गए। जब दिन निकला एक नाले के किनारे तीनों आदमियों ने बैठ जरूरी कामों से छुट्टी पा स्नान-संध्या किया और फिर रवाना हुए। पहर दिन चढ़ते-चढ़ते एक बड़े जंगल में ये लोग पहुंचे 1 जहां से वह नाला जिसमें चंद्रकान्ता और चपला थीं, दो कोस बाकी था। तेजसिंह ने कहा, “दिन इसी जंगल में बिताना चाहिए। शाम हो जाय तो


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लेप दिया और निश्चिन्त हो राजकुमारी के पलंग पर जा लेटी। इस मसाले में यह गुण था कि जिस जमीन पर उसका लेप किया जाये सूख जाने पर अगर किसी का पैर उस जमीन पर पड़े तो जोर से पटाखे की आवाज आवे, मगर देखने से यह न मालूम हो कि इस जमीन पर कुछ लेप किया है। रात भर चम्पा आराम से सोई रही। कोई आदमी उस कमरे के अन्दर न आया, सुबह को चम्पा ने पानी से वह मसाला धो डाला। दूसरे दिन उसने दूसरी चालाकी। मिट्टी की एक खोपड़ी बनाई और उसको रंग कर ठीक चन्द्रकान्ता की मूरत बनाकर जिस पलंग पर कुमारी सोया करती थी तकिए


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