को पूछने वाले कौन हो, तुम्हें मतलब?” तेजसिंह ने उठकर एक लात मारी और कहा, “बताता है कि मतलब पूछता है।” अब तो उसने बेउज्र कहना शुरू कर दिया कि ”महारानी कई दिनों से गायब हैं, कहीं पता नहीं लगता, महल में गुल-गपाड़ा मचा हुआ है, इससे ज्यादे कुछ नहीं जानते।” तेजसिंह ने कुमार से कहा, “अब पता लगाना कई रोज का काम हो गया, आप अपने लश्कर में जाइये, मैं ढूंढने की फिक्र करता हूं।” कुमार ने कहा, “अब मैं लश्कर में न जाऊंगा।” तेजसिंह ने कहा, “अगर आप ऐसा करेंगे तो भारी आफत होगी, शिवदत्त को यह खबर लगी तो फौरन लड़ाई शुरू कर देगा,महाराज जयसिंह यह हाल पाकर और भी घबड़ा जायेंगे, आपके पिता सुनते ही सूख जायेंगे।” कुमार ने कहा, “चाहे जो हो, जब चंद्रकान्ता ही नहीं है तो दुनिया में कुछ हो मुझे क्या परवाह!” तेजसिंह ने बहुत समझाया कि ऐसा न करना चाहिए, आप धीरज न छोड़िये, नहीं तो हम लोगों का भी जी टूट
ठीक मालूम होती है, इसके बारे में जैसा हुक्म हो, किया जाये।’’ महाराज ने कहा, ‘‘ठीक है, हम खुद इस बात के लिए तुमसे कहने वाले थे। खैर, अब कहे देते हैं कि तुम धीरे-धीरे सब मुसलमानों को नाजुक कामों से बाहर कर दो।’’ हरदयालसिंह ने कहा, ‘‘बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा।’’ यह कह महाराज से रुखसत हो अपने घर चले आये। चन्द्रकान्ता ( पहला भाग : बीसवां बयान) महाराज शिवदत्तसिंह ने घसीटासिंह और चुन्नीलाल को तेजसिंह को पकड़ने के लिए भेजकर दरबार बर्खास्त किया और महल में चले गये, मगर दिल उनका रम्भा की जुल्फों