की नहीं थी, ज्योतिषीजी ने कई दफे आपके पतिव्रत धर्म की तारीफ की थी और कहा था कि महाराज की जुदाई में महारानी को बड़ा ही दुख होता होगा, यह जान हम लोग आपको ले आये थे नहीं तो खाली चंपा को ही छुड़ाने गये थे। अब आप कहिए तो चुनार पहुंचा दें नहीं तो महाराज के पास ले जायं क्योंकि सिवाय मेरे और किसी के जरिये आप महाराज के पास नहीं पहुंच सकतीं, और फिर महाराज क्या जाने कब तक कैद रहें। महारानी-तुम लोगों ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा की, सचमुच मुझे महाराज से इतनी जल्दी मिलाने वाला और कोई नहीं जितनी जल्दी तुम मिला सकते हो। अभी मुझको उनके पास पहुंचाओ, देर मत करो, मैं तुम लोगों का बड़ा जस मानूंगी! तेज-तो इस तरह डोली में आप नहीं जा सकतीं, मैं बहोश करके आपको ले जा सकता हूं। महारानी-मुझको यह भी मंजूर है, किसी तरह वहां पहुंचाओ। तेज-अच्छा तब लीजिए इस शीशी को सूंघिये। महारानी को अपने पति के
महाराज बोले, “यह कैसे मालूम कि यह लाश बनावटी हैं?” तेजसिंह ने कहा, “यह कोई बड़ी बात नहीं है, लाश के पास चलिए मैं अभी बतला देता हूं।” यह सुन महाराज तेजसिंह के साथ लाश के पास गए, महारानी भी गईं। तेजसिंह ने अपनी कमर से खंजर निकालकर चपला की लाश की टांग काट ली और महाराज को दिखलाकर बोले, “देखिए इसमें कहीं हड्डी है।” महाराज ने गौर से देखकर कहा, “ठीक है, बनावटी लाश है।” इसके पीछे चंद्रकान्ता की लाश को भी इसी तरह देखा, उसमें भी हड्डी नहीं पाई। अब सबों को मालूम हो गया कि ऐयारी की गई है। महाराज बोले,