चंद्रकान्ता को ढूंढते हुए यहां तक पहुंच गये और उन्हीं की उम्मीद में बर्देफराशों के डेरे देख डाले। उनको तो न पाया मगर महारानी और तुम फंसी हुई दिखाई दीं, छुड़ाने की फिक्र हुई। पन्नालाल, रामनारायण और चुन्नीलाल को महारानी को छुड़ाने के लिए कोशिश करते देख हम लोग यह समझकर अलग हो गए कि मेहनत वे लोग करें, मौके में मौका हम लोगों को भी काम करने का मिल ही जायगा। सो ऐसा ही हुआ भी, तुम अपनी ही चालाकी से छूटकर बाहर निकल गईं, हमने महारानी को गायब किया। खैर इन सब बातों को जाने दो, तुम यह बताओ कि घर न जाओगी तो क्या करोगी? कहां ढूंढोगी? कहीं ऐसा न हो कि हम लोग तो कुमारी को खोजकर विजयगढ़ ले जायं और तुम महीनों तक मारी-मारी फिरो।” चंपा ने कहा, “मैं एकदम से ऐसी बेवकूफ नहीं, आप बेफिक्र रहें।” तेजसिंह को लाचार होकर चंपा को उसकी मर्जी पर छोड़ना पड़ा और ज्योतिषीजी को भी उसी जंगल में छोड़ महारानी की गठरी
न हुआ, यह देख महाराज बहुत घबड़ाए और तेजसिंह से बोले, “अब क्या करना चाहिए?” बहुत देर तक गौर करने के बाद तेजसिंह ने कहा कि “कुमार को उठवा के उनके रहने के कमरे में भिजवाना चाहिए, वहां अकेले में मैं इनका इलाज करूंगा।” यह सुन महाराज ने उन्हें खुद उठाना चाहा मगर तेजसिंह ने कुमार को गोद में ले लिया और उनके रहने वाले कमरे में ले चले । महाराज भी संग हुए। तेजसिंह ने कहा, “आप साथ न चलिए, ये अकेले ही में अच्छे होंगे।” महाराज उसी जगह ठहर गये। तेजसिंह कुमार को लिए हुए उनके कमरे में पहुंचे और चारपाई