पास पहुंचे इनके चेहरे पर कुछ हंसी देख तेजसिंह का जी ठिकाने हुआ। पूछा, “क्यों क्या है जो आप दौड़े आये हैं?” ज्योतिषी-है क्या, बस हम भी आपके साथ उसी तहखाने में चलेंगे। तेज-सो क्यों? ज्योतिषी-इसका हाल भी वहीं मालूम होगा, यहां न कहेंगे। तेज-तो वहां दरवाजे पर पट्टी भी बांधानी पड़ेगी, क्योंकि पहले वाले ताले का हाल जब से कुमार को धोखा देकर बद्रीनाथ ने मालूम कर लिया तब से एक और ताला हमने उसमें लगाया है जो पहले ही से बना हुआ था मगर आसकत से उसको काम में नहीं लाते थे क्योंकि खोलने और बंद करने में जरा देर लगती है। हम यह निश्चय कर चुके हैं कि इस ताले का भेद किसी को न बतावेंगे। ज्योतिषी-मैं तो अपनी आंखों पर पट्टी न बंधाऊंगा और उस तहखाने में भी जरूर जाऊंगा। तुम झख मारोगे और ले चलोगे। तेज-वाह क्या खूब! भला कुछ हाल तो मालूम हो! ज्योतिषी-हाल क्या, बस पौ बारह है! कुमारी चंद्रकान्ता
रहा था कि चंद्रकान्ता जीती है और उसको दुश्मन लिये जाते हैं?” तेजसिंह ने कहा, “मैं कहता था और सच कह रहा था! कुमारी जीती हैं मगर दुश्मन उनको चुरा ले गए हैं और उनकी जगह नकली लाश रख इधर-उधर रंग फैला दिया है जिससे लोग कुमारी को मरी हुई जानकर पीछा और खोज न करें।” कुमार ने कहा, “तुम हमें धोखा देते हो! हम कैसे जानें कि वह लाश नकली है?” तेजसिंह ने कहा, “मैं अभी आपको यकीन करा देता हूं।” यह कह कमरे का दरवाजा खोला, देखा कि महाराज खड़े हैं, आंखों से आंसू जारी हैं। तेजसिंह को देखते ही पूछा, “क्या हाल है?”