न दिया मगर तेजसिंह ने कहा, “महाराज, जरूरत ही ऐसी थी कि कुमार को बड़े सबेरे यहां से जाना पड़ा, उस वक्त आप आराम में थे, इसलिए कुछ कह न सके।” बाद इसके तेजसिंह ने कुल हाल, लड़ाई से चुनार जाना, महाराज शिवद्त्त की रानी को चुराना, खोह में कुमारी का पता लगाना, ज्योतिषीजी की मुलाकात, बर्देफरोशों की कैफियत, उस तहखाने में कुमारी और चपला को देख उनकी जुबानी तिलिस्म का हाल आदि सब-कुछ हाल पूरा-पूरा ब्यौरेवार कह सुनाया, आखिर में यह भी कहा कि अब हम लोग तिलिस्म तोड़ने जाते हैं। इतना लंबा-चौड़ा हाल सुनकर महाराज हैरान हो गये। बोले, “तुम लोगों ने बड़ा ही काम किया इसमें कोई शक नहीं, हद के बाहर काम किया, अब तिलिस्म तोड़ने की तैयारी है, मगर वह तिलिस्म दूसरे के राज्य में है। चाहे वहां का राजा तुम्हारे यहां कैद हो तो भी पूरे सामान के साथ तुम लोगों को जाना चाहिए, मैं भी तुम लोगों के साथ चलूं तो ठीक है।” तेजसिंह ने कहा,
में गये और अपनी चादर हवा में दो-तीन दफे उछाली। चादर उछालनी थी कि झट बद्रीनाथ ऐयार महाराज शिवद्त्त के लश्कर से निकल के मैदान में देवीसिंह के पास आये और बोले, “जय माया की!” देवीसिंह ने भी जवाब दिया, “जय माया की!” बद्रीनाथ ने पूछा, “क्यों क्या बात है जो मैदान में आकर ऐयारों को बुलाते हो?” देवी-तुमसे एक बात कहनी है! बद्री-कहो। देवी-तुम्हारी फौज में मर्द बहुत हैं कि औरत? बद्री-औरत की सूरत भी दिखाई नहीं देती! देवी-तुम्हारे यहां कोई बहादुर भी है कि सब गरीब सिपाहियों की जान लेने और आप