पड़ीं। इस बीच में कुमार की निगाह भी उसी तस्वीर पर जा पड़ी, एकटक देखते रहे और जब वनकन्या बहुत दूर निकल गई तब फतहसिंह से बातचीत करने लगे। कुमार-क्यों फतहसिंह, यह कौन है कुछ जानते हो? फतहसिंह-मैं कुछ भी नहीं जानता मगर इतना कह सकता हूं कि किसी राजा की लड़की है। कुमार-यह किताब जो इसके हाथ में है जरूर वही है जो मुझको तिलिस्म से मिली थी, जिसको शिवदत्त के ऐयारों ने चुराया था, जिसके लिए तेजसिंह और बद्रीनाथ में बदाबदी हुई और जिसकी खोज में हमारे ऐयार लगे हुए हैं! फतहसिंह-मगर फिर वह किताब इसके हाथ कैसे लगी? कुमार-इसका तो ताज्जुब हई है मगर इससे भी ज्यादे ताज्जुब की एक बात और है, शायद तुमने ख्याल नहीं किया। फतह-नहीं, वह क्या? कुमार-वह तस्वीर भी मेरी ही है जिसको बगल वाली औरत के हाथ से उसने लिया था। फतह-यह तो आपने और भी आश्चर्य


365 of 692

अब तो तेजसिंह ने अपने बटुए में से सामान निकाल रोशनी की जिससे साफ मालूम हुआ कि जितने पहरे वाले पहले दिन देखे थे, सब जख्मी होकर मरे पड़े हैं। अंदर घुसे, कुमारी और चपला का पता नहीं, हां दोनों के गहने सब टूटे-फूटे पड़े थे और चारों तरफ खून जमा हुआ था। कुमार से न रहा गया, एकदम ‘हाय’ करके गिर पड़े और आंसू बहाने लगे। तेजसिंह समझाने लगे कि ”आप इतने बेताब क्यों हो गये। जिस ईश्वर ने यहां तक हमें पहुंचाया वही फिर उस जगह पहुंचायेगा जहां कुमारी है!” कुमार ने कहा, “भाई, अब मैं चंद्रकान्ता के मिलने से नाउम्मीद हो गया,


365 of 1085