करना वगैरह सब खुलासा हाल कह सुनाया। क्रूरसिंह ने नाजिम के पकड़े जाने का हाल सुनकर कुछ अफसोस तो किया मगर पीछे तेजसिंह के गिरफ्तार होने की उम्मीद सुनकर उछल पड़ा, और बोला, ‘‘लो, अभी हजार रुपये देता हूँ, बल्कि खुद तुम्हारे साथ चलता हूँ’’ यह कहकर उसने हजार रुपये सन्दूक में से निकाले और नाजिम के साथ हो लिया। जब नाजिम क्रूरसिंह को साथ लेकर वहाँ पहुंचा जहाँ अहमद और केतकी को छोड़ा था तो दोनों में से कोई न मिला। नाजिम तो सन्न हो गया और उसके मुंह से झट यह बात निकल पड़ी कि ‘धोखा हुआ !’ क्रूरसिंहः कहो नाजिम, क्या हुआ !’ नाजिमः क्या कहूं, वह जरूर केतकी नहीं कोई ऐयार था जिसने पूरा धोखा दिया और अहमद को तो ले ही गया। क्रूरसिंहः खूब, तुम तो बाग में ही चपला के हाथ से पिट चुके थे, अहमद बाकी था सो वह भी इस वक्त कहीं जूते खाता होगा, चलो छुट्टी हुई। नाजिम ने शक मिटाने के लिए
सोच-समझ चपला शरमा गई और गर्दन नीची कर चुप हो रही, मगर जी में तेजसिंह की सफाई और चालाकी की तारीफ करने लगी, बल्कि सच तो यह है कि तेजसिंह की मुहब्बत ने उसके दिल में जगह बना ली। चन्द्रकान्ता ने बड़ी मुहब्बत से वीरेन्द्रसिंह का खत पढ़ा और तब तेजसिंह से बातचीत करने लगी- चन्द्रकान्ता: क्यों तेजसिंह, उनका मिजाज तो अच्छा है ? तेजसिंह: मिजाज क्या खाक अच्छा होगा ? खाना-पीना सब छूट गया, रोते-रोते आँखें सूज आईं, दिन-रात तुम्हारा ध्यान है, बिना तुम्हारे मिले उनको कब आराम है। हजार समझाता हूँ मगर कौन सुनता है