पास आ गये। पन्नालाल ने पुकार के कहा, “क्यों तेजसिंह, अब तो हार गये न!” तेज-हम क्यों हारे! बद्री-क्यों नहीं हारे, हम छूट भी गये और किताब भी न दी। तेज-किताब तो हम पा गये, तुम चाहे आपसे आप छूटो या मेरे छुड़ाने से छूटो! किताब पाना ही हमारा जीतना हो गया, अब तुमको चाहिए कि महाराज शिवदत्त को छोड़कर कुमार के साथ रहो। बद्री-हमको वह किताब दिखा दो, हम अभी ताबेदारी कबूल करते हैं। तेज-तो तुम ही क्यों नहीं दिखा देते, जब तुम्हारे पास नहीं तो साबित हो गया कि हम पा गये। बद्री-बस-बस, हम बेफिक्र हो गये, तुम्हारी बातचीत से मालूम हो गया कि तुमने किताब नहीं पाई और उसे कोई तीसरा ही उड़ा ले गया, अभी तक हम डरे हुए थे। देवी-फिर आखिर हारा कौन यह भी तो कहो? बद्री-कोई भी नहीं हारा। कुमार-अच्छा यह तो कहो तुम छूटे कैसे! बद्री-बस ईश्वर ने छुड़ा दिया,


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आयेगा? यह सोच अशर्फी तो अपने खलीते में रख ली और कहा, “यह कौन बड़ी बात है, हम बता देते हैं!” उस शीशी का मुंह खोलकर सूंघा, बस फिर क्या था सूंघते ही जमीन पर लेट गया, दीन दुनिया की खबर न रही, बेहोश होने पर देवीसिंह उस सिपाही की गठरी बांधा तेजसिंह के पास ले आये और कहा कि ”यह किले का पहरा देने वाला है, पहले इससे पूछ लेना चाहिए, अगर काम न चलेगा तो फिर दूसरी तरकीब की जायगी।” यह कह उस सिपाही को होश में लाये। वह हैरान हो गया कि यकायक यहां कैसे आ फंसे,देवीसिंह को उसी देहाती पंडित की सूरत में सामने


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