जानबूझ के कोई तरकीब नहीं की गई। पन्नालाल ने उसके सिर पर एक लकड़ी रखी, उस पत्थर के आदमी ने मुझको छोड़ लकड़ी पकड़ी बस मैं छूट गया। उसके हाथ में वह लकड़ी अभी तक मौजूद है। कुमार-अच्छा हुआ, दोनों की ही बात रह गई। बद्री-कुमार, मेरा जी तो चाहता है कि आपके साथ रहूं मगर क्या करूं, नमकहरामी नहीं कर सकता, कोई तो सबब होना चाहिए! अब मुझे आज्ञा हो तो बिदा होऊं। कुमार-अच्छा जाओ। ज्यो-अच्छा हमारी तरफ नहीं होते तो न सही मगर ऐयारी तो बंद करो। तेज-वाह ज्योतिषीजी, आखिर वेदपाठी ही रहे। ऐयारी से क्या डरना? ये लोग जितना जी चाहें जोर लगा लें! पन्ना-खैर देखा जायगा, अभी तो जाते है, जय माया की! तेज-जय माया की! बद्रीनाथ वगैरह वहां से चले गए। फिर कुमार भी तिलिस्म में न गये और अपने डेरे में चले आए। रात को कुमार के डेरे में सब ऐयार और फतहसिंह इकट्ठे हुए।
खड़े देखा, दूसरी ओर दो बहादुर और दिखाई दिये, कुछ कहा ही चाहता था कि देवीसिंह ने पूछा, “यह बताओ कि तुम्हारी महारानी कहां हैं? बताओ जल्दी!” उस सिपाही ने हाथ-पैर बंधे रहने पर भी कहा कि ”तुम महारानी को पूछने वाले कौन हो, तुम्हें मतलब?” तेजसिंह ने उठकर एक लात मारी और कहा, “बताता है कि मतलब पूछता है।” अब तो उसने बेउज्र कहना शुरू कर दिया कि ”महारानी कई दिनों से गायब हैं, कहीं पता नहीं लगता, महल में गुल-गपाड़ा मचा हुआ है, इससे ज्यादे कुछ नहीं जानते।” तेजसिंह ने कुमार से कहा, “अब पता लगाना कई रोज