मुंह धुलाया, अब साफ पहचाने गये कि यह पंडित बद्रीनाथ हैं। कुमार ने पूछा, “क्यों अब तुम्हारे साथ क्या किया जाय?” बद्रीनाथ ने जवाब दिया, “जो मुनासिब हो कीजिये।” कुमार ने फतहसिंह से कहा, “इनकी तुम हिफाजत करो, जब तेजसिंह आवेंगे तो वही इनका फैसला करेंगे!” यह सुन फतहसिंह बद्रीनाथ को ले अपने खेमे में चले गये। शाम को बल्कि कुछ रात बीते तेजसिंह, देवीसिंह और ज्योतिषीजी लौटकर आये और कुमार के खेमे में गए। उन्होंने पूछा, “कहो कुछ पता लगा?” तेजसिंह-कुछ पता न लगा, दिन भर परेशान हुए मगर कोई काम न चला। कुमार-(ऊंची सांस लेकर) फिर अब क्या किया जायेगा? तेज-किया क्या जायेगा, आज-कल में पता लगेगा ही। कुमार-हमने भी एक ऐयार को गिरफ्तार किया है। तेज-हैं, किसको? वह कहां है! कुमार-फतहसिंह के पहरे में है, उसको बुला के देखो कौन है! देवीसिंह को भेजकर फतहसिंह को


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की मगर कुछ काम न निकला। चन्द्रकान्ता ( दूसरा भाग : नौवां बयान) तेजसिंह पहरे वाले सिपाही की सूरत में किले के दरवाजे पर पहुंचे। कई सिपाहियों ने जो सबेरा हो जाने के सबब जाग उठे थे तेजसिंह की तरफ देखकर कहा, “जैरामसिंह, तुम कहां चले गये थे? यहां पहरे में गड़बड़ पड़ गया। बद्रीनाथजी ऐयार पहरे की जांच करने आये थे, तुम्हारे कहीं चले जाने का हाल सुनकर बहुत खफा हुए और तुम्हारा पता लगाने के लिए आप ही कहीं गए हैं, अभी तक नहीं आये। तुम्हारे सबब से हम लोगों पर खफगी हुई!” जैरामसिंह (तेजसिंह) ने कहा, “मेरी


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