बुरी मालूम होती है। अपने बाप के जरिये उसने महाराज जयसिंह के कान तक आपकी लगावट का हाल पहुँचा दिया है और इसी सबब से पहरे की यह सख्त तकीद हो गई है। आपको ले चलना अभी मुझे पसन्द नहीं जब तक कि मैं वहां जाकर फसादियों को गिरफ्तार न कर लूं। “इस वक्त मैं फिर विजयगढ जाकर चन्द्रकान्ता और चपला से मुलाकात करता हूँ क्योंकि चपला ऐयारा और चन्द्रकान्ता की प्यारी सखी है और चन्द्रकान्ता को जान से ज्यादा मानती है। सिवाय इस चपला के मेरा साथ देने वाला वहां कोई नहीं है। जब मैं अपने दुश्मनों की चालाकी और कार्यवाई देख कर लौटूं तब आपके चलने के बारें में राय दूँ। कहीं ऐसा न हो कि बिना समझे बूझे काम करके हमलोग वहां ही गिरफ्तार हो जायं।” वीरेन्द्र – जो मुनासिब समझो करो, मुझको तो सिर्फ़ अपनी ताकत का भरोसा है लेकिन तुमको अपनी ताकत और ऐयारी दोनों का। तेजसिंह – मुझे यह भी पता लगा है कि हाल ही में क्रूरसिंह के दोनों ऐयार
तक पहुँचाई जिससे साफ मालूम होता है कि जितनी मुहब्बत मैं चन्द्रकान्ता से रखता हूँ उतनी ही चन्द्रकान्ता मुझसे रखती है, और हमारे राज्य के बीच सिर्फ़ पाँच ही कोस का फासला भी है, तिस पर भी हमलोगों के किये कुछ नहीं बन पड़ता। देखो इस खत में भी चन्द्रकान्ता ने यही लिखा है कि ‘जिस तरह बने जल्द मिल जाओ।” तेजसिंह ने जवाब दिया, “मैं हर तरह से आपको वहां ले जा सकता हूँ मगर एक तो आजकल चन्द्रकान्ता के पिता महाराज जयसिंह ने महल के चारों तरफ सख्त पहरा बैठा रक्खा है, दुसरे उनके मन्त्री का लड़का क्रूरसिंह उस पर आशिक हो रहा है, ऊपर