जो भी हो वनकन्या के बिना मेरी जिंदगी मुश्किल है, मैं जरूर उसके लिखे मुताबिक इकरारनामा लिख दूंगा पीछे समझा जायगा। कुमारी चंद्रकान्ता मेरी बात जरूर मान लेगी। देवीसिंह और ज्योतिषीजी को भी कुमार ने वह खत दिखाई। वे लोग भी हैरान थे कि वनकन्या ने यह क्या लिखा और इसका जवाब क्या देना चाहिए। दिन और रात भर कुमार इसी सोच में रहे कि इस खत का क्या जवाब दिया जाय। दूसरे दिन सुबह होते-होते तेजसिंह भी पंडित बद्रीनाथ ऐयार की गठरी पीठ पर लादे हुए आ पहुंचे। कुमार ने पूछा, “वापस क्यों आ गये?” तेज-क्या बतावें मामला ही बिगड़ गया। कुमार-सो क्या? तेज-तहखाने का दरवाजा नहीं खुलता। कुमार-किसी ने भीतर से तो बंद नहीं कर लिया। तेज-नहीं भीतर तो कोई ताला ही नहीं है। ज्यो-दो बातों में से एक बात जरूर है, या तो कोई नया आदमी पहुंचा जिसने दरवाजा खोलने की कल बिगाड़ दी, या फिर महाराज
की जान गई, इसका खुलासा हाल मैं तब कहूंगा जब आप इस बात का वादा कर लें कि मुझको अपना ऐयार या साथी बनावेंगे।” ज्योतिषीजी की बात सुन कुमार ने तेजसिंह की तरफ देखा। तेजसिंह ने कहा, “ज्योतिषीजी, मैं बड़ी खुशी से आपको साथ रखूंगा परंतु आपको इसके पहले अपने साफ दिल होने की कसम खानी पड़ेगी।” ज्योतिषीजी ने तेजसिंह के मन से शक मिटाने के लिए जनेऊ हाथ में लेकर कसम खाई, तेजसिंह ने उठ के उन्हें गले लगा लिया और बड़ी खुशी से अपने ऐयारों की पंगत में मिला लिया। कुमार ने अपने गले से कीमती माला निकाल ज्योतिषीजी को पहना