खबर है?” तेज-अच्छी खबर है। कुमार-कुछ कहोगे भी कि इसी तरह? तेज-आप सुन के क्या कीजिएगा? कुमार-क्या मेरे सुनने लायक नहीं है? तेज-आपके सुनने लायक क्यों नहीं है मगर अभी न कहेंगे। कुमार-भला कुछ तो कहो? तेज-कुछ भी नहीं। देवी-भला ओस्ताद हमें भी बताओगे या नहीं? तेज-क्या तुमने ओस्ताद कहकर पुकारा इससे तुमको बता दें? देवी-झख मारोगे और बताओगे! तेज-(हंसकर) तुम कौन-सा जस लगा आए पहले यह तो कहो? देवी-मैं तो आपकी शागिर्दी में बट्टा लगा आया। तेज-तो बस हो चुका। ये बातें हो ही रही थीं कि चोबदार ने आकर हाथ जोड़ अर्ज किया कि ”महाराज शिवदत्त के दीवान आये हैं।” सुनकर कुमार ने तेजसिंह की तरफ देखा फिर कहा, “अच्छा आने दो, उनके साथ वाले बाहर ही रहें।” महाराज शिवदत्त के दीवान खेमे में हाजिर हुए और सलाम
मैदान में पहुंची, दूर से वह बगुला दिखाई पड़ा जिसके पेट में कुमारी पड़ चुकी थी। सब जगहों को देखना छोड़ चपला उस बगुले के पास धाड़धाड़ाती हुई पहुंची। उसने मुंह खोल दिया। चपला को बड़ा ताज्जुब हुआ, पीछे हटी। बगुले ने मुंह बंद कर दिया। सोचने लगी अब क्या करना चाहिए। यह तो कोई बड़ी भारी ऐयारी मालूम होती है। क्या भेद है इसका पता लगाना चाहिए। मगर पहले कुमारी को खोजना उचित है क्योंकि यह खण्डहर कोई पुराना तिलिस्म मालूम होता है, कहीं ऐसा न हो कि इसी में कुमारी फंस गई हो। यह सोच उस जगह से हटी और दूसरी तरफ खोजने