क्या!” तेज-हां एक बढ़िया चीज हाथ लगी है? कुमार-क्या है? कहां है? देखूं। तेज-खेमे के बाहर चलिये तो दिखाऊं। कुमार-चलो। कुंअर वीरेन्द्रसिंह तेजसिंह के पीछे-पीछे खेमे के बाहर हुए। देखा कुछ दूर पर रोशनी हो रही है और बहुत से आदमी इकट्ठे हैं। पूछा, “यह भीड़ कैसी है?”तेजसिंह ने कहा, “चलिए देखिये, बड़ी खुशी की बात है!” कुमार के पास पहुंचते ही भीड़ हटा दी गई। कई मशाल जल रहे थे जिनकी रोशनी में कुमार ने देखा कि क्रूरसिंह की खून से भरी हुई लाश पड़ी है,कलेजे में एक खंजर घुसा हुआ अभी तक मौजूद है। कुमार ने तेजसिंह से कहा, “क्यों तेजसिंह, आखिर तुमने इसको मार ही डाला।” तेज-भला हम लोग एकाएक इस तरह किसी को मारते हैं? कुमार-तो फिर किसने मारा? तेज-मैं क्या जानूं। कुमार-फिर लाश को कहां से लाये? तेज-बालादवी करते (गश्त लगाते) हम लोग इस
जंगल-जंगल पहाड़-पहाड़ मारी फिरी मगर कहीं पता न लगा। कई दिन की थकी-मांदी जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठकर सोचने लगी कि अब कहां चलना चाहिए और किस जगह ढूंढना चाहिए, क्योंकि महारानी से मैं इतना वादा करके निकली हूं कि कुंअर वीरेन्द्रसिंह और तेजसिंह से बिना मिले और बिना उनसे कुछ खबर लिए कुमारी का पता लगाऊंगी, मगर अभी तक कोई उम्मीद पूरी न हुई और बिना काम पूरा किये मैं विजयगढ़ भी न जाऊंगी चाहे जो हो, देखूं कब तक पता नहीं लगता। जंगल में एक पेड़ के नीचे बैठी हुई चंपा इन सब बातों को सोच रही थी कि सामने से