सुबह हो गई। सूरज निकल आया। तेजसिंह ने अहमद की गठरी खोली। उसका ऐयारी का बटुआ और खंजर जो कमर में बंधा था, ले लिया और एक बेड़ी उसके पैर में डालने के बाद होशियार किया। जब अहमद होश में आया और उसने अपने को इस दिलचस्प मैदान में देखा तो यकीन हो गया कि वह मर गया है और फरिश्ते उसको यहां ले आये हैं। लगा कलमा पढ़ने। तेजसिंह के उसके कलमा पढ़ने पर हंसी आई, बोले, ‘‘मियां साहब, आप हमारे कैदी हैं, इधर देखिए !’’ अहमद ने तेजसिंह की तरफ देखा, पहचानते ही जान सूख गई, समझ गया कि तब न मरे तो अब मरे। बीवी केतकी की सूरत आंखों के सामने फिर गई, खौफ ने उसका गला ऐसा दबाया कि एक हर्फ भी मुंह से न निकल सका। अहमद को उसी मैदान में चश्मे के किनारे छोड़ दोनों ऐयार बाहर निकल आये। तेजसिंह ने देवीसिंह से कहा, ‘‘इस शेर की जुबान जो तुमने बाहर खींच ली है उसी के मुंह में डाल


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बखेड़ा इसी वास्ते किया जा रहा है जिससे तुम्हारी उनसे हमेशा के लिए मुलाकात हो, अगर तुम ही घबड़ा जाओगी तो कैसे काम चलेगा ? बहुत-कुछ समझा-बुझाकर चन्द्रकान्ता को चुप कराया, तब वहाँ से रवाना हो केतकी की सूरत में दरवाजे पर आये। देखा तो दो-चार प्यादे होश में आये हैं बाकी चित्त पड़े हैं, कोई औंधा पड़ा है, कोई उठा तो है मगर फिर झुका ही जाता है। नकली केतकी ने डपट कर दरबानों से कहा, ‘‘तुम लोग पहरा देते हो या जमीन सूँघते हो ?’’ इतनी अफीम क्यों खाते हो कि आंखें नहीं खुलतीं, और सोते हो तो मुर्दों से बाजी लगाकर ! देखो, मैं बड़ी रानी


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