खूबसूरत पलंग बिछा हुआ पाया। मसहरी पर लेटकर तरह-तरह की बातें सोचने लगे। इस मकान का मालिक कौन है और मुलाकात न करने में उसने क्या फायदा सोचा है, यहां कब तक पड़े रहना होगा, वहां लश्कर वालों की हमारी खोज में क्या दशा होगी, इत्यादि बातों को सोचते-सोचते कुमार को नींद आ गई और बेखबर सो गये। दो घंटे रात बीते तक कुमार सोये रहे। इसके बाद बीन की और उसके साथ ही किसी के गाने की आवाज कानों में पड़ी। झट आंखें खोल इधर-उधरदेखने लगे, मालूम हुआ कि यह वह कमरा नहीं है जिसमें भोजन करके सोये थे, बल्कि इस वक्त अपने को एक निहायत खूबसूरत सजी हुई बारहदरी में पाया जिसके बाहर से बीन और गाने की आवाज आ रही थी। कुमार पलंग पर से उठे और बाहर देखने लगे। रात बिल्कुल अधेरी थी मगर रोशनी खूब हो रही थी जिससे मालूम पड़ा कि यह बाग भी वह नहीं है जिसमें दिन को स्नान और भोजन किया था।
गया, ऊपर की तरफ मुंह करके बोली, “मी सगमता।”[1] वह औरत जो आई थी चंपा का मुंह देखने लगी। थोड़ी देर के बाद वह भी अपने पैर के अंगूठे की तरफ देख और हाथों से उसे मलती हुई बोली, “चपकला छटमे बापरोफस।”[2] फिर दोनों में से कोई न बोली। शाम हो गई। सब औरतें उस रावटी में पहुंच गईं। रात को खाने का सामान पहुंचा। महारानी और चंपा के सिवाय सभी ने खाया। उन दोनों औरतों ने तो खूब ही हाथ फेरे जो नई फंसकर आई थीं। रात बहुत चली गई, सन्नाटा हो गया, रावटी के चारों तरफ पहरा फिरने लगा। रावटी