को होता है।” इन सबों की ये बातें सुनकर कुमार की तो अक्ल चकरा गई। कभी ताज्जुब कभी सोच, कभी घबराहट से इनकी अजब हालत हो गई। आखिर उन औरतों की तरफ देखकर बोले, “फसाद क्यों करती हो हम तो आप ही तुम लोगों के साथ चलने को तैयार हैं, चलो देखें तुम्हारी राजकुमारी का दरबार कैसा है।” एक-जब आप खुद चलने को तैयार हैं तब हम लोगों को ज्यादे बखेड़ा करने की क्या जरूरत है, चलिए। कुमार-चलो। वे सब औरतें गिनती में नौ थीं, चार कुमार के आगे चार पीछे हो उनको लेकर रवाना हुईं और एक यह कहकर चली गई कि मैं पहले खबर करती हूं कि फलाने डाकू को हम लोगों ने गिरफ्तार किया है जिसको साथ वाली सखियां लिए आती हैं। वे सब कुमार को लिए बाग के एक कोने में गईं जहां दूसरी तरफ निकल जाने के लिए छोटा-सा दरवाजा नजर पड़ा जिसमें शीशे की सिर्फ एक सफेद हांडी जल रही थी। वे सब कुमार को लिए हुए
नहीं तो हम सब भेद खोल देंगे कि मर्द हो, धोखा देने आये हो, पकडे ज़ाओगे, लाचार होकर उसकी बेड़ी काट दी और वह मौका पाकर निकल गई। मगर महारानी को कौन ले गया?” दीवान साहब की अक्ल हैरान थी कि क्या हो गया। बोले, “इन बदमाशों को बल्कि इनके बुङ्ढे मियां सरदार को मार-पीटकर पूछो, कहीं इन्हीं लोगों की बदमाशी तो नहीं है।” पन्नालाल ने कहा, “जब सरदार ही आपकी कैद में है तो मुझे यकीन नहीं आता कि उसके सबब से महारानी गायब हो गई हैं। आप इन बर्देफरोशों को और फौज को लेकर जाइये और राज्य का काम देखिए। हम लोग