एकदम उनके दिमाग तक ठंडक पहुंच गई साथ ही आंखों में झपकी आने लगी और धीरे – धीरे बिल्कुल बेहोश होकर उसी गद्दी पर लेट गये। चन्द्रकान्ता ( तीसरा भाग : बारहवां बयान) कुंअर वीरेन्द्रसिंह के गायब होने से उनके लश्कर में खलबली पड़ गई। तेजसिंह और देवीसिंह ने घबराकर चारों तरफ खोज की मगर कुछ पता न लगा। दिन भर बीत जाने पर ज्योतिषीजी ने तेजसिंह से कहा, “रमल से जान पड़ता है कि कुमार को कई औरतें बेहोशी की दवा सुंघा बेहोश कर उठा ले गई हैं और नौगढ़ के इलाके में अपने मकान के अंदर कैद कर रखा है, इससे ज्यादे कुछ मालूम नहीं होता।” ज्योतिषीजी की बात सुनकर तेजसिंह बोले, “नौगढ़ में तो अपना ही राज्य है, वहां कुमार के दुश्मनों का कहीं ठिकाना नहीं। महाराज सुरेन्द्रसिंह की अमलदारी से उनकी रियाया बहुत खुश तथा उनके और उनके खानदान के लिए वक्त पर जान देने को तैयार है फिर कुमार को ले जाकर कैद करने वाला
के औतार हुए हैं 1 थोड़ी दूर जाकर ये लोग आपस में कुछ बातें कर मिलने का ठिकाना ठहरा अलग हो गये। शब्दार्थ: ↑ हम पहचान गये ↑ चुप रहोगी तो तुम्हारी भी जान बच जायेगी ↑ मेरी बेड़ी तोड़ दो, नहीं तो गुल कर गिरफ्तार करा दूंगी ↑ तुम्हारी क्या दशा होगी ↑ रानी का साथ दूंगी ↑ ‘बर्देफरोश’ आदमियों की सौदागिरी कहते हैं, अर्थात् लौंडी-गुलाम बेचते हैं चन्द्रकान्ता ( दूसरा भाग : सत्रहवाँ बयान) एक बहुत बड़े नाले में जिसके चारों तरफ बहुत ही घना जंगल था, पंडित जगन्नाथ ज्योतिषी के साथ तेजसिंह बैठे हैं।