जयसिंह ने चढ़ाई कर ही दी, मुनासिब है कि हम भी पहुंचकर चुनार का बखेड़ा ही तय कर दें, यह रोज-रोज की खटपट अच्छी नहीं! राजा-तुम्हारा कहना ठीक है, ऐसा ही किया जाय, क्या कहें हमने सोचा था कि लड़के के ही हाथ से चुनार फतह हो जिससे उसका हौसला बढ़े मगर अब बर्दाश्त नहीं होता। इन सब बातों और खबरों को सुन तीनों ऐयार वहां से रवाना हो गए और एकांत में जाकर आपस में सलाह करने लगे। तेज-अब क्या करना चाहिए? देवी-चाहे जो भी हो पहले तो कुमार को ही खोजना चाहिए। तेज-मैं कहता हूं कि तुम लश्कर की तरफ जाओ और हम दोनों कुमार की खोज करते हैं। ज्यो-मेरी बात मानो तो पहले एक दफे उस तहखाने (खोह) में चलो जिसमें महाराज शिवदत्त को कैद किया था। तेज-उसका तो दरवाजा ही नहीं खुलता। ज्यो-भला चलो तो सही, शायद किसी तरकीब से खुल जाय। तेज-इसकी कोशिश तो आप बेफायदे
छूटकर बाहर निकल गईं, हमने महारानी को गायब किया। खैर इन सब बातों को जाने दो, तुम यह बताओ कि घर न जाओगी तो क्या करोगी? कहां ढूंढोगी? कहीं ऐसा न हो कि हम लोग तो कुमारी को खोजकर विजयगढ़ ले जायं और तुम महीनों तक मारी-मारी फिरो।” चंपा ने कहा, “मैं एकदम से ऐसी बेवकूफ नहीं, आप बेफिक्र रहें।” तेजसिंह को लाचार होकर चंपा को उसकी मर्जी पर छोड़ना पड़ा और ज्योतिषीजी को भी उसी जंगल में छोड़ महारानी की गठरी बांधा कैदखाने वाले खोह की तरफ रवाना हुए जिसमें महाराज बंद थे। चंपा भी एक तरफ को रवाना हो गई।