कैफियत जानने के लिए जिद करने लगे। आखिर तेजसिंह ने वहां का हाल जो कुछ अपने गुरु से सुना था, कहा, जिसे सुनकर वीरेन्द्रसिंह बहुत प्रसन्न हुए। तेजसिंह ने वीरेन्द्रसिंह से कहा, वे इतना खुश क्यों हुए, और यह घाटी कैसी थी यह सब हाल किसी दूसरे मौके पर बयान किया जायेगा। वे दोनों वहाँ से रवाना हो अपने महल आये। कुमार ने कहा, ‘‘भाई, अब तो मेरा हौसला बहुत बढ़ गया है। जी में आता है कि जयसिंह से लड़ जाऊँ।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘आपका हौसला ठीक है, मगर जल्दी करने से चन्द्रकान्ता की जान का खौफ है। आप इतना घबराते क्यों है ? देखिए, तो क्या होता है ? कल मैं फिर जाऊँगा और मालूम करूँगा कि अहमद के पकड़े जाने से दुश्मनों की क्या कैफियत हुई, फिर दूसरी बार आपको ले चलूंगा।’’ वीरेन्द्रसिंह ने कहा, ‘‘नहीं, अब की बार मैं जरूर चलूंगा, इस तरह एकदम डरपोक होकर बैठे रहना मर्दों का काम नहीं।’’ तेजसिंह ने कहा, ‘‘अच्छा,
उस तहखाने के पास पहुंचा जिसमें नाजिम कैद था तो भीतर से चिल्लाने की आवाज आयी जिसे सुन उसने पहचान लिया कि नाजिम की आवाज है। तहखाने के किवाड़ खोल अन्दर गया, नाजिम को बंधा-पा झट से उसकी रस्सी खोली और तहखाने के बाहर आकर बोला, ‘‘चलो जल्दी, इस बगीचे के बाहर हो जायें तब सब हाल सुनें कि क्या हुआ।’’ नाजिम और अहमद बगीचे के बाहर आये और चलते-चलते आपस में बाच-चीत करने लगे। नाजिम ने चपला के हाथ फंस जाने और कोड़ा खाने का पूरा हाल कहा। अहमदः भाई नाजिम, जब तक पहले चपला को हम लोग न पकड़