चपला-आजकल ये पागल हो गये हैं, मैं देखा करती हूं कि कभी-कभी चिल्लाया और इधर-उधर दौड़ा करते हैं। बिल्कुल हालत पागलों की-सी पाई जाती है,इनकी बातों का कुछ ख्याल मत करो? शिव-उल्टे मुझी को पागल बनाती है! तेज-(शिवद्त्त से) क्या कहा, फिर तो कहो? शिव-कुछ नहीं, तुम चपला से बातें करो, मैं तो आजकल पागल हो गया हूं। देवी-वाह, क्या पागल बने हैं। शिव-चपला का कहना बहुत सही है, मेरे पागल होने में कोई शक नहीं। कुमार-ज्योतिषीजी, जरा इन नई गढ़न्त के पागल को देखना! ज्यो-(हंसकर) जब आकाशवाणी हो ही चुकी कि ये पागल हैं तो अब क्या बाकी रहा? कुमार-दिल में कई तरह के खुटके पैदा होते हैं। तेज-इसमें जरूर कोई भारी भेद है। न मालूम वह कब खुलेगा, लाचारी यही है कि हम कुछ कर नहीं सकते! देवी-हमारी ओस्तादिन इस भेद को जानती हैं मगर उनको अभी इस भेद को
कही थीं। उस वक्त यह भी न सोचा कि ब्राह्मण है। अब क्यों मेरी तरफ लाल-लाल आंखें करके देखते हैं!” ज्योतिषीजी की बातें सुनकर शिवदत्त ने सिर नीचा कर लिया और कुछ जवाब न दिया। इतने में एक बारीक आवाज आई, “तेजसिंह!” तेजसिंह ने सिर उठाकर उधर देखा जिधर से आवाज आई थी, चंद्रकान्ता नजर पड़ी जिसे देखते ही इनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। हाय, क्या सूरत हो रही है, सिर के बाल खुले हैं, गुलाब-सा मुंह कुम्हला गया, बदन पर मैल चढ़ी हुई है, कपड़े फटे हुए हैं, पहाड़ के ऊपर एक छोटी-सी गुफा के बाहर खड़ी’तेजसिंह-तेजसिंह’,