जा ऐयारों को उठवा लाए, हथकड़ी – बेड़ी डालकर खेमे में कैर कर पहरा मुकर्रर कर दिया। महाराज जयसिंह और सुरेन्द्रसिंह गले मिले, जीतसिंह की बहुत कुछ तारीफ करके दोनों राजों ने कई इलाके उनको दिये, जिनकी सनद भी उसी वक्त मुहर करके उनके हवाले की गई। रात बीत गई, पूरब की तरफ से धीरे – धीरे सफेदी निकलने लगी और लड़ाई बंद कर दी गई। शब्दार्थ: बेहोशी की बारूद से आग लगने या मकान उड़ जाने का खौफ नहीं होता, उसमें धुआं बहुत होता है और जिसके दिमाग में धुआं चढ़ जाता है वह फौरन बेहोश हो जाता है। चन्द्रकान्ता ( तीसरा भाग : अठारहवाँ बयान) तेजसिंह वगैरह ऐयारों के साथ कुमार खोह से निकल कर तिलिस्म की तरफ रवाना हुए। एक रात रास्ते में बिता कर दूसरे दिन सवेरे जब रवाना हुए तो एक नकाबपोश सवार दूर से दिखाई पड़ा, जो कुमार की तरफ ही आ रहा था। जब इनके करीब पहुँचा,
ही देर बाद यहां तक खींचा कि चपला का पैर न जम सका, वह खिंचकर उसके पेट में चली गई साथ ही बेहोश भी हो गई। जब चपला होश में आई उसने अपने को एक कोठरी में पाया जो बहुत तंग सिर्फ दस-बारह आदमियों के बैठने लायक होगी। कोठरी के बगल में ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई थीं। चपला थोड़ी देर तक अचंभे में भरी हुई बैठी रही, तरह-तरह के ख्याल उसके जी में पैदा होने लगे, अक्ल चकरा गई कि यह क्या मामला है। आखिर चपला ने अपने को सम्हाला और सीढ़ी के रास्ते छत पर चढ़ गई, जाते ही सीढ़ी का दरवाजा बंद हो गया। नीचे