घोड़े से उतर जमीन पर कुछ रख दूर जा खड़ा हुआ। कुमार ने वहाँ जा कर देखा तो तिलिस्मी किताब नजर पड़ी और एक खत, जिसे देख वे बहुत खुश हो कर तेजसिंह से बोले – ‘तेजसिंह, क्या करें, यह वनकन्या मेरे ऊपर बराबर अपने अहसान के बोझ डाल रही है। इसमें कोई शक नहीं कि यह उसी का आदमी है तो तिलिस्मी किताब मेरे रास्ते में रख दूर जा खड़ा हुआ है। हाय, इसके इश्क ने भी मुझे निकम्मा कर दिया है। देखें इस खत में क्या लिखा है।’ यह कह कर कुमार ने खत पढ़ा – ‘किसी तरह यह तिलिस्मी किताब मेरे हाथ लग गई जो तुम्हें देती हूँ। अब जल्दी तिलिस्म तोड़ कर कुमारी चंद्रकांता को छुड़ाओ। वह बेचारी बड़ी तकलीफ में पड़ी होगी। चुनारगढ़ में लड़ाई हो रही है, तुम भी वहीं जाओ और अपनी जवाँमर्दी दिखा कर फतह अपने नाम लिखाओ। – तुम्हारी दासी… वियोगिनी।’ कुमार – ‘तेजसिंह तुम भी पढ़ लो।’ तेजसिंह – (खत पढ़


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उतरने की जगह न थी। इधर-उधर देखने लगी। चारों तरफ ऊंचे-ऊंचे पहाड़, सामने एक छोटा-सी खोह नजर पड़ी जो बहुत अंधेरी न थी क्योंकि आगे की तरफ से उसमें रोशनी पहुंच रही थी। चपला लाचार होकर उस खोह में घुसी। थोड़ी ही दूर जाकर एक छोटा-सा दलान मिला, यहां पहुंचकर देखा कि कुमारी चंद्रकान्ता बहुत से बड़े-बड़े पत्तो आगे रखे हुए बैठी है और पत्तो पर पत्थर की नोक से कुछ लिख रही है। नीचे झांककर देखा तो बहुत ही ढालवीं पहाड़ी, उतरने की जगह नहीं, उसके नीचे कुंअर वीरेन्द्रसिंह और ज्योतिषीजी खड़े ऊपर की तरफ देख रहे हैं।


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