कर) ‘न मालूम यह वनकन्या मनुष्य है या अप्सरा, कैसे-कैसे काम इसके हाथ से होते हैं।’ कुमार – (ऊँची साँस ले कर) ‘हाय, एक बला हो तो सिर से टले?’ देवीसिंह – ‘मेरी राय है कि आप लोग यहीं ठहरें, मैं चुनारगढ़ जा कर पहले सब हाल दरियाफ्त कर आता हूँ।’ कुमार – ‘ठीक है, अब चुनारगढ़ सिर्फ पाँच कोस होगा, तुम वहाँ की खबर ले आओ, तब हम चलें क्योंकि कोई बहादुरी का काम करके हम लोगों का जाहिर होना ज्यादा मुनासिब होगा।’ देवीसिंह चुनारगढ़ की तरफ रवाना हुए। कुमार को रास्ते में एक दिन और अटकना पड़ा, दूसरे दिन देवीसिंह लौट कर कुमार के पास आए और चुनारगढ़ की लड़ाई का हाल, महाराज जयसिंह के गिरफ्तार होने की खबर, और जीतसिंह की ऐयारी की तारीफ कर बोले – ‘लड़ाई अभी हो रही है, हमारी फौज कई दफा चढ़ कर किले के दरवाजे तक पहुँची मगर वहाँ अटक कर दरवाजा नहीं तोड़ सकी, किले की तोपों


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कुमारी चंद्रकान्ता के कान में चपला के पैर की आहट पहुंची, फिर के देखा, पहचानते ही उठ खड़ी हुई और बोली, “वाह सखी, खूब पहुंची। देख सब कोई नीचे खड़े हैं, कोई ऐसी तरकीब नजर नहीं आती कि मैं उन तक पहुंचूं। उन लोगों की आवाज मेरे कान तक पहुंचती है मगर मेरी कोई नहीं सुनता। तेजसिंह ने पूछा है कि तुम किस राह से यहां आई हो, उसी का जवाब इस पत्तो पर लिख रही हूं, इसे नीचे फेंकूंगी।” चपला ने पहले खूब ध्यान करके चारों तरफ देखा, नीचे उतरने की कोई तरकीब नजर न आई, तब बोली, “कोई जरूरत पत्तो पर लिखने


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