की मार ने हमारा बहुत नुकसान किया।’ इन खबरों को सुन कर कुमार ने तेजसिंह से कहा – ‘अगर हम लोग किसी तरह किले के अंदर पहुँच कर फाटक खोल सकते तो बड़ी बहादुरी का काम होता।’ तेजसिंह – ‘इसमें तो कोई शक नहीं कि यह बड़ी दिलावरी का काम है, या तो किले का फाटक ही खोल देंगे, या फिर जान से हाथ धोवेंगे।’ कुमार – ‘हम लोगो के वास्ते लड़ाई से बढ़ कर मरने के लिए और कौन-सा मौका है? या तो चुनारगढ़ फतह करेंगे या बैकुंठ की ऊँची गद्दी दखल करेंगे, दोनों हाथ लड्डू हैं।’ तेजसिंह – ‘शाबाश, इससे बढ़ कर और क्या बहादुरी होगी, तो चलिए हम लोग भेष बदल कर किले में घुस जाएँ। मगर यह काम दिन में नहीं हो सकता।’ कुमार – ‘क्या हर्ज है, रात ही को सही। रात-भर किले के अंदर ही छिपे रहेंगे, सुबह जब लड़ाई खूब रंग पर आएगी उसी वक्त फाटक पर टूट पड़ेंगे। सब ऊपर फसीलों पर चढ़े


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की नहीं है। मैं पुकार के कहे देती हूं, मेरी आवाज वे लोग बखूबी सुनेंगे, पहले यह बताओ तुमको बगुला निगल गया था या किसी दूसरी राह से आई हो?” कुमारी ने कहा, “हां मुझको वही बगुला निगल गया था जिसको तुमने उस खंडहर में देखा होगा, शायद तुमको भी वही निगल गया हो।” चपला ने कहा, “नहीं मैं दूसरी राह से आई हूं, पहले उस खण्डहर का पता इन लोगों को दे लूं तब बातें करूं, जिससे ये लोग भी कोई बंदोबस्त हम लोगों के छुड़ाने का करें। जहां तक मैं सोचती हूं मालूम होता है कि हम लोग कई दिनों तक यहां फंसे रहेंगे, खैर जो होगा देखा


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