तरफ दिखाई देने लगे। फतहसिंह ने बुर्ज पर से महाराज शिवदत्त का सब्ज झंडा गिरा कर अपना जर्द झंडा खड़ा कर दिया और अपने हाथ से चोब उठा कर जोर से तीन चोट डंके पर लगाई जो उसी झंडे के नीचे रखा हुआ था। ‘क्रूम-धूम फतह’ की आवाज निकली जिसके साथ ही किले वालों का जी टूट गया और कुँवर वीरेंद्रसिंह की मुहब्बत दिल में असर कर गई। अपने हाथ से कुमार ने फाटक पर चालीस आदमियों के सिर काटे थे, मगर ऐयारों के सहित वे भी जख्मी हो गए थे। राजा सुरेंद्रसिंह किले के अंदर घुसे ही थे कि कुमार, तेजसिंह और देवीसिंह झंडियाँ लिए चरणों पर गिर पड़े, ज्योतिषी जी ने आशीर्वाद दिया। इससे ज्यादा न ठहर सके, जख्मों के दर्द से चारों बेहोश हो कर जमीन पर गिर पड़े और बदन से खून निकलने लगा। जीतसिंह ने पहुँच कर चारों के जख्मों पर पट्टी बाँधी, चेहरा धुलने से ये चारों पहचाने गए। थोड़ी देर में ये सब होश में आ गए। राजा सुरेंद्रसिंह अपने


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मुर्दों से बुरी हालत में नहीं रह सकती!” तेजसिंह ने कुमार का हाथ पकड़ लिया और बहुत कुछ समझा-बुझाकर ठण्डा किया। कुमार ने तेजसिंह से कहा, “अगर मुनासिब समझो और हर्ज न हो तो कुमारी के मां-बाप को भी यहां लाकर कुमारी का मुंह दिखला दो, भला कुछ उन्हें भी तो ढाढ़स हो।” तेजसिंह ने कहा, “यह कभी नहीं हो सकता, इस तहखाने को आप मामूली न समझिए, जो कुछ कहना होगा मुंहजबानी सब हाल उनको समझा दिया जायगा। अब यह फिक्र करनी चाहिए जिससे कुमारी की जान छूटे। चलिए सब कोई महाराज जयसिंह को यह हाल कहते हुए उस खण्डहर तक


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