चंद्रकांता को छुड़ाइए।’ कुमार – ‘अच्छा चलिए, यह काम तो आज ही खत्म हो जाए।’ तीनों ऐयारों को साथ ले कर कुँवर वीरेंद्रसिंह उस तिलिस्म में घुसे। जो कुछ उस तिलिस्मी किताब में लिखा हुआ था खूब ख्याल कर लिया और उसी तरह काम करने लगे। खँडहर के अंदर जा कर उस मालूमी दरवाजे को खोला जो उस पत्थर वाले चबूतरे के सिरहाने की तरफ था। नीचे उतर कर कोठरी में से होते हुए उसी बाग में पहुँचे जहाँ खजाने और बारहदरी के सिंहासन के ऊपर का वह पत्थर हाथ लगा था, जिसको छू कर चपला बेहोश हो गई थी और जिसके बारे में तिलिस्मी किताब में लिखा हुआ था कि वह एक डिब्बा है और उसके अंदर एक नायाब चीज रखी है। चारों आदमी नहर के रास्ते गोता मार कर उसी तरह बाग के उस पार हुए जिस तरह चपला उसके बाहर गई थी और उसी की तरह पहाड़ी के नीचे वाली नहर के किनारे-किनारे चलते हुए उस छोटे-से दालान में पहुँचे जिसमें
जायेंगे।” यह सुन देवीसिंह नौगढ़ की तरफ रवाना हुए। सबेरे ही से कुंअर वीरेन्द्रसिंह विजयगढ़ से गायब थे, बिना किसी से कुछ कहे ही चले गये थे इसलिए महाराज जयसिंह बहुत ही उदास हो कई जासूसों को चारों तरफ खोजने के लिए भेज चुके थे। शाम होते-होते ये लोग विजयगढ़ पहुंचे और महाराज से मिले। महाराज ने कहा, “कुमार तुम इस तरह बिना कहे-सुने जहां जी में आता है चले जाते हो, हम लोगों को इससे तकलीफ होती है, ऐसा न किया करो!” इसका जवाब कुमार ने कुछ न दिया मगर तेजसिंह ने कहा, “महाराज, जरूरत ही ऐसी थी कि