तो उसको जरूर यकीन हो जाता कि ऐसे महात्मा की बात भला कौन काट सकता है?’ वृद्ध योगी ने कड़क कर कहा – ‘क्या मैं झूठा हूँ? क्या तू क्षत्रिय है? क्षत्रियों के यही धर्म होते हैं? क्यों वे अपनी प्रतिज्ञा को भूल जाते हैं? क्या तूने किसी से विवाह की प्रतिज्ञा नहीं की? ले देख, पढ़ किसका लिखा हुआ है?’ यह कह कर अपनी जटा के नीचे से एक खत निकाल कर कुमार के हाथ में दे दिया। पढ़ते ही कुमार चौंक उठे। ‘हैं, यह तो मेरा ही लिखा है। क्या लिखा है? ‘मुझे सब मंजूर है।’ इसके दूसरी तरफ क्या लिखा है? हाँ, अब मालूम हुआ, यह तो उस वनकन्या का खत है। इसी में उसने अपने साथ ब्याह करने के लिए मुझे लिखा था, उसके जवाब में मैंने उसकी बात कबूल की थी। मगर खत इनके हाथ कैसे लगा? वनकन्या का इनसे क्या वास्ता?’ कुछ ठहर कर कुमार ने पूछा – ‘क्या इस वनकन्या को आप जानते हैं?’ इसके जवाब में फिर कड़क के वृद्ध योगी


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किवाड़ के पल्ले को कमंद से बंधा देख तेजसिंह को मालूम हो गया कि यह चपला की कार्रवाई है और जरूर यह कमंद भी चपला की ही है, क्योंकि इसके एक सिरे पर उसका नाम खुदा हुआ है, मगर इस किवाड़ का बांधाना बेफायदे हुआ क्योंकि इसमें घुसकर चपला निकल न सकी। कुएं को भी बखूबी देखते हुए उस चबूतरे के पास आये जिस पर पत्थर का आदमी हाथ में किताब लिए सोया हुआ था। चपला की तरह तेजसिंह ने भी यहां धोखा खाया। चबूतरे के ऊपर चढ़ने वाली सीढ़ी पर पैर रखते ही उसके ऊपर का पत्थर आवाज देकर पल्ले की तरह खुला और तेजसिंह धम्म


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