बोले – ‘अभी तक जानने को कहता है? क्या उसे तेरे सामने कर दूँ?’ इतना कह कर एक लात जमीन पर मारी, जमीन फट गई और उसमें से वनकन्या ने निकल कर कुमार के पाँव पकड़ लिए। चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : पहला बयान) वनकन्या को एकाएक ज़मीन से निकल पैर पकड़ते देख कुंवर वीरेन्द्रसिंह एकदम घबरा उठे। देर तक सोचते रहे कि यह क्या मामला है, यहां वनकन्या क्योंकर आ पहुंची और यह योगी कौन हैं जो इसकी मदद कर रहे हैं? आखिर बहुत देर तक चुप रहने के बाद कुमार ने योगी से कहा, “मैं इस वनकन्या को जानता हूं। इसने हम पर बड़ा भारी उपकार किया है और मैं इससे बहुत कुछ वादा कर भी चुका हूं, लेकिन मेरा वह वादा बिना कुमारी चन्द्रकान्ता के मिले पूरा नहीं हो सकता। देखिये इस चिट्ठी में जो आपने दी है, क्या शर्त है! खुद इन्होंने लिखा है कि मुझसे और कुमारी चन्द्रकान्ता से एक ही दिन शादी हो और इस बात को मैंने
से जमीन पर गिर पड़े। इनके गिरने पर कुमार को हंसी आ गई, मगर देवीसिंह बड़े गुस्से में आये। कहने लगे, “सब शैतानी इसी आदमी की है जो इस पर सोया है,ठहरो मैं इसकी खबर लेता हूं!” यह कहकर उछलकर बड़े जोर से एक धौल उसके सिर पर जमाई। धौल का लगना था कि वह पत्थर का आदमी उठ बैठा, मुंह खोल दिया, हाथी की तरह उसके मुंह से हवा निकलने लगी, मालूम होता था कि भूकंप आया है, सबों की तबीयत घबरा गई। ज्योतिषीजी ने कहा, “जल्दी इस मकान से बाहर भागो ठहरने का मौका नहीं है!” इस दलान से दूसरे दलान में