: (तेज़सिंह की तरफ देखकर) क्या तुम्हारी अक्ल भी घास चरने चली गई? इन लाशों को देखकर इतना न पहचान सके कि ये मर्दो की लाशें है या औरतों की? इसकी लम्बाई और बनावट पर भी कुछ खयाल न किया? तेज़सिंह : (घबरा कर दोनों लाशों की तरफ गौर से देखकर शर्माकर) मुझसे बड़ी भूल हुई कि मैंने इन दोनों लाशों की तरफ गौर नहीं किया, कुमार के साथ ही मैं भी घबरा गया था। हकीकत में ये दोनों लाशें मर्दों की हैं, औरतों की नहीं। योगी : ऐयारों से ऐसी भूल का होना कितने शर्म की बात है। इस ज़रा-सी भूल से कुमार की जान जा चुकी थी। (उँगली से इशारा करके) देखो उस तरफ उन दोनों पहाड़ियों के बीच में इतना कहना बहुत है, क्योंकि तुम इस तहखाने का हाल जानते हो, अपने उस्ताद से सुन चुके हो। तेज़सिंह ने उस तरफ देखा, साथ ही टकटकी बंध गयी। कुमार भी उस तरफ घूमे मगर उनको न पाया, वनकन्या भी दिखाई न पड़ी, बल्कि यह भी मालूम
मुनासिब होगा किया जायगा। मगर यहां कई रोज लगेंगे, महाराज का रहना ठीक नहीं है, बेहतर है कि वे विजयगढ़ जायं।” इस राय को सबों ने पसंद किया। कुमार ने महाराज से कहा, “आप सिर्फ इस खण्डहर को देखने आये थे सो देख चुके अब जाइये। आपका यहां रहना मुनासिब नहीं।” महाराज विजयगढ़ जाने पर राजी न थे मगर सबों के जिद करने से कबूल किया। कुमार की जितनी फौज थी उसको और अपनी जितनी फौज साथ आई थी उसमें से भी आधी फौज साथ ले विजयगढ़ की तरफ रवाना हुए। चन्द्रकान्ता ( दूसरा भाग : चौबीसवाँ बयान) रात