न हुआ कि वे दोनों किस राह से आये थे और कब चले गये? जब तक वनकन्या और योगीजी यहां थे, उनके आने का रास्ता भी खुला हुआ था, दीवार में दरार मालूम पड़ती थी, ज़मीन फटी हुई दिखाई देती थी, मगर अब कहीं कुछ नहीं था। चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : दूसरा बयान) आखिर कुंवर वीरेन्द्रसिंह ने तेज़सिंह से कहा, ‘‘मुझे अभी तक यह न मालूम हुआ कि योगी जी ने उंगली के इशारे से तुम्हें क्या दिखलाया और इतनी देर तक तुम्हारा ध्यान कहां अटका रहा, तुम क्या देखते रहे और अब वे दोनों कहां गायब हो गये?’’ तेज़सिंह : क्या बतायें कि दोनों कहां चले गये? कुछ खुलासा हाल उनसे न मिल सका, अब बहुत कठिन प्रयास करना पड़ेगा। वीरेन्द्रसिंह : आखिर तुम उस तरफ क्या देखने लगे थे? तेज़सिंह : हम क्या देखते थे इस हाल के कहने में बड़ी देर लगेगी, और अब यहां इन मुर्दों की बदबू से रुका नहीं जाता। इन्हें इसी जगह छोड़ इस तिलिस्म से


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भर जगन्नाथ ज्योतिषी रमल फेंकने और विचार करने में लगे रहे। कुंअर वीरेन्द्रसिंह, तेजसिंह और देवीसिंह भी रात भर पास ही बैठे रहे। सब बातों को देख-भालकर ज्योतिषीजी ने कहा, “रमल से मालूम होता है कि इस तिलिस्म के तोड़ने की तरकीब एक पत्थर पर खुदी हुई है और वह पत्थर भी इसी खण्डहर में किसी जगह पड़ा हुआ है। उसको तलाश करके निकालना चाहिए तब सब पता चलेगा। स्नान-पूजा से छुट्टी पा कुछ खा-पीकर इस तिलिस्म में घूमना चाहिए, जरूर उस पत्थर का भी पता लगेगा।” सब कामों से छुट्टी पाकर दोपहर को सब लोग खण्डहर में घुसे। देखते-भालते


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