बाहर चलिये, वहां जो कुछ हाल है, कहूंगा। मगर यहां से चलने के पहले उसे देख लीजिये, जिसे इतनी देर तक मैं ताज्जुब से देख रहा था। वह दोनों पहाड़ियों के बीच में जो दरवाज़ा खुला नज़र आ रहा है, वो पहले बन्द था, यही ताज्जुब की बात थी। अब चलिये, मगर हम लोगों को कल फिर यहां लौटना पड़ेगा। यह तिलिस्म ऐसी राह पर बना हुआ है कि अन्दर वहां तक आने में लगभग पांच कोस का फासला मालूम पड़ता है और बाहर की राह से अगर इस तहखाने तक आवें तो पन्द्रह कोस चलना पड़ेगा। कुमार : खैर, यहां से चलो, मगर इस हाल का खुलासा सुने बिना तबीयत घबरा रही है। जिस तरह चारों आदमी तिलिस्म की राह से यहां तक पहुंचे थे उसी तरह तिलिस्म के बाहर हुए। आज उन लोगों को बाहर आने तक आधी रात बीत गयी। इनके लश्कर वाले घबरा रहे थे पहले तो पहर दिन बाकी रहते बाहर निकल आते थे, आज क्या देर हुई? जब वे लोग खेमे में पहुंचे


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उसी चबूतरे के पास पहुंचे जिस पर पत्थर का वह आदमी सोया हुआ था जिसे देवीसिंह ने धौल जमाई थी। उस आदमी को फिर उसी तरह सोता पाया। ज्योतिषीजी ने तेजसिंह से कहा, “यह देखो ईंटों का ढेर लगा हुआ है, शायद इसे चपला ने इकट्ठा किया हो और इसके ऊपर चढ़कर इस आदमी को देखा हो। तुम भी इस पर चढ़ के खूब गौर से देखो तो सही किताब में जो इसके हाथ में है क्या लिखा है?” तेजसिंह ने ऐसा ही किया और उस ईंट के ढेर पर चढ़कर देखा। उस किताब में लिखा था- 8 पहल- 5-अंक 6 हाथ- 3-अंगुल जमा पूंजी-0-जोड़,


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