तो सभी का जी ठिकाने हुआ। तेज़सिंह ने कुमार से कहा, ‘‘इस वक़्त आप सो जायें कल आपसे कुछ कहना है, कहूंगा।’’ चन्द्रकान्ता ( चौथा भाग : तीसरा बयान) यह तो मालूम है कि कुमारी चन्द्रकान्ता जीती हैं। मगर कहां हैं, और उस खोह में से क्यों निकल गयीं, वनकन्या कौन है, योगी जी कहां से आये, तेज़सिंह को उन्होंने क्या दिखाया? इत्यादि बातों को सोचते और खयाल दौड़ाते कुमार ने सुबह कर दी, एक घड़ी की नींद नहीं आयी। अभी सवेरा नहीं हुआ था कि पलंग से उतर जल्दी के मारे खुद तेज़सिंह के डेरे में गये। वे अभी तक सोये थे, उन्हें जगाया। तेज़सिंह ने उठकर कुमार को सलाम किया। जी में समझ ही गये थे वही बात पूछने के लिए कुमार बेताब हैं और इसी से इन्होंने आकर मुझे इतनी जल्दी उठाया है मगर फिर भी पूछा, ‘‘कहिये, क्या है जो इतने सवेरे आप उठे हैं?’’ कुमार : रात भी नींद नहीं आयी, अब जो कुछ कहना हो जल्दी कहो, जी बेचैन है।
ठीक नाप तोड़। तेजसिंह ने ज्योतिषीजी को समझाया कि इस पत्थर की किताब में ऐसा लिखा है, मगर इसका मतलब क्या है कुछ समझ में नहीं आता। ज्योतिषीजी ने कहा, “मतलब भी मालूम हो जायगा, तुम एक कागज पर इसकी नकल उतार लो।” तेजसिंह ने अपने बटुए में से कागज कलम दवात निकाल उस पत्थर की किताब में जो लिखा था उसकी नकल उतार ली। ज्योतिषीजी ने कहा, “अब घूमकर देखना चाहिए कि इस मकान में कहीं आठ पहल का कोई खंभा या चबूतरा किसी जगह पर है या नहीं।” सब कोई उस खंडहर में घूम-घूमकर आठ पहल का खंभा या