तेज़सिंह : अच्छा, आप बैठिये मैं कहता हूं। कुमार बैठ गये और देवीसिंह तथा ज्योतिषीजी को भी उसी जगह बुलवा भेजा। जब वे आ गये, तेज़सिंह ने कहना शुरू किया, ‘‘यह तो मुझे अभी तक मालूम नहीं हुआ कि कुमारी चन्द्रकान्ता को कौन ले गया या वह योगी कौन थे और वनकन्या की मदद क्यों करने लगे? मगर उन्होंने जो कुछ दिखाया वह इतने ताज्जुब की बात थी कि मैं उसे देखने में ही डूबा और योगी जी से कुछ पूछ न सका और वे भी बिना कुछ खुलासा हाल कहे चलते बने। उस दिन पहले-पहल जब मैं आपको खोह में ले गया तब वहां का हाल जो कुछ मैंने अपने गुरुजी से सुना था सो आपसे कहा था याद है?’’ कुमार : बखूबी याद है। तेज़सिंह : मैंने क्या कहा था? कुमार : तुमने यही कहा था कि उसमें बड़ा खज़ाना है, मगर उस पर एक छोटा-सा तिलिस्म बंधा हुआ है जो बहुत सहज में टूट सकेगा, क्योंकि उसके तोड़ने की युक्ति तुम्हारे उस्ताद तुम्हें कुछ बता
चबूतरा तलाश करने लगे। घूमते-घूमते उस दलान में पहुंचे जहां तहखाना था। एक सिरा कमंद का तहखाने की किवाड़ के साथ और दूसरा सिरा जिस खंभे के साथ बंधा हुआ था, उसी खंभे को आठ पहल का पाया। उस खंभे के ऊपर कोई छत न थी, ज्योतिषीजी ने कहा, “इसकी लंबाई हाथ से नापनी चाहिए।” तेजसिंह ने नापा, 6 हाथ 7 अंगुल हुआ, देवीसिंह ने नापा 6 हाथ 5 अंगुल हुआ, बाद इसके ज्योतिषीजी ने नापा, 6 हाथ 10 अंगुल पाया, सब के बाद कुंअर वीरेन्द्रसिंह ने नापा, 6 हाथ 3 अंगुल हुआ। ज्योतिषीजी ने खुश होकर कहा, “बस यही खंभा है, इसी का