गये हैं। तेज़सिंह : हां ठीक है, मैंने यही कहा था। उस खोह में मैंने आपको एक दरवाज़ा दो पहाड़ियों के बीच दिखाया था, जिसे योगी ने मुझे इशारे से बताया था। उस दरवाज़े को खुला देख मुझे मालूम हो गया कि उस तिलिस्म को किसी ने तोड़ डाला और वहां का खज़ाना ले लिया, उसी वक़्त मुझे यह खयाल आया कि योगी ने उस दरवाज़े की तरफ इसलिए इशारा किया कि जिसने तिलिस्म तोड़ कर वह खज़ाना लिया है वही कुमारी चन्द्रकान्ता को भी ले गया होगा। इस सोच और तरद्दुद में डूबा हुआ मैं एकटक उस दरवाज़े की तरफ देखता रह गया और योगी महाराज चलते बने। तेज़सिंह की इतनी बात सुनकर बड़ी देर तक कुमार चुप बैठे रहे, बदहवासी सी आ गयी, इसके बाद सम्हल कर बैठे और बोले– कुमार : तो कुमारी चन्द्रकान्ता फिर एक नयी बला में फँस गयी? तेज़सिंह : मालूम तो ऐसा ही पड़ता है। कुमार : तब इसका पता कैसे लगे? अब क्या करना चाहिए?
पता इस किताब में लिखा है, इसी के नीचे ‘जमा पूंजी’ यानी वह पत्थर जिसमें तिलिस्म तोड़ने की तरकीब लिखी हुई है गड़ा है। यह भी मालूम हो गया कि यह तिलिस्म कुमार के हाथ से ही टूटेगा, क्योंकि उस किताब में जिसकी नकल कर लाये हैं उसका नाप 6 हाथ 3 अंगुल लिखा है जो कुमार ही के हाथ से हुआ, इससे मालूम होता है कि यह तिलिस्म कुमार ही के हाथ से फतह भी होगा। अब इस कमंद को खोल डालना चाहिए जो इस खंभे और किवाड़ के पल्ले में बंधी हुई है।” तेजसिंह ने कमंद खोलकर अलग किया, ज्योतिषीजी ने तेजसिंह की तरफ देख के कहा, “सब बातें